फिल्म नहीं, एक असर : हैदर

एक अच्छा और समझदार निर्देशक अपने दर्शको से डरता नही है. उसे डर नही कि कहीं दूसरी ज़्यादा कमरशियल वैल्यू वाली फिल्म उसकी फिल्म पर हावी हो जाए. विशाल भारद्वाज भी उन्ही कुछ निर्देशको में से एक है. बैंग – बैंग जैसी तड़कदार और मसालेदार फिल्म से उन्हे डर नही लगा. इसलिए क्योंकि उनके पास ‘हैदर’ थी और इसलिए भी क्योंकि उन्हें अपने दर्शको पर भरोसा है.

वे उन्मे से नही जो रीलिज़ डेट्स को ले कर लड़े. जैसा की ढ़ेर सारे छोटे निर्देशक जिन्हे अपने बड़े होने कि गलतफहमी है, करते है. विशाल को हमारे स्वाद पर अब भी भरोसा है, जबकि दूसरो को हमारे खाली वक्त के आने का इन्तज़ार.

किसी भी उपन्यास या नाटक को फिल्म के रूप में पेश करना एक बेहद ही मुश्किल कला है. एक साहित्य से जुड़ा हुआ, हर समाजिक विषयो की जानकारी रखने और पढ़ने वाला ही इस कला को निभा सकता है.

ऐसा बिल्कुल नही हुआ होगा कि विशाल “हैमलेट” पढ़े होंगे और फिर तीन-चार महिने लगा दिये होंगे यह सोचने में कि इसे भारतीय परिस्थितियो में कैसे उतारुं. हुआ ऐसा होगा कि विशाल जब ‘हैमलेट’ पढ़ रहे होंगे, उसी वक्त उन्हे कश्मीर के हालातो की याद आई होगी. क्योंकि वे कश्मीर के बारे मे पढ़ते रहे होंगे तभी ‘हैमलेट’ से जोड़ पाये होंगे.

मैं ऐसा नही कह रहा कि यही हुआ होगा. मगर जब आप एक फिल्म देखते है तो निर्देशक की समझदारी से भी सांझा होते है. पता लग जाता है कि फिल्म बनाते वक्त क्या चल रहा होगा निर्देशक के दिमाग में.

‘हैदर’ का किरदार इस फिल्म मे सिर्फ एक किरदार नही है. वह अपने पिता को ढूंढ रहा है. उसे अपनी माँ पर भरोसा नही रहा. उसका घर जल चुका है. उसका चाचा साथी भी है और दुश्मन भी. वो लोग जो उसके अपने नही उस से कहते है कि उसके अपने ही उसके अपने नही. उसे वो भड़काते है अपने ही खून से बदला लेने के लिए. हैदर एक जवाब ढूंढता है और उसे दस सवाल मिलते है. इसी असमंजस में वह बिलख रहा है, जल रहा है.

दरअसल देखा जाए तो हैदर कश्मीर ही तो है. जिसे पता नही कि वो कहाँ जाये. कौन उसके साथ है और कौन नही.

किसी भी फिल्म की कहानी में छुपी होती है उस फिल्म को लिखने की वजह. एक थीम होती है कहानी की

‘इंतकाम से आज़ादी ही असली आज़ादी है’.
‘हैमलेट’ की कहानी को इसी थीम से जोड़ दिया है विशाल ने और बना दिया ‘हैदर’.

दो सबसे अच्छी चीज़े है ‘हैदर’ में. एक तो लाजवाब निर्देशन और दूसरा अभिनेताओं का चयन. शाहीद कपूर हो या श्रधा कपूर, तब्बू हो या के के मेनन. सभी ने ज़ोरदार काम किया है. फिल्म के बीच में एक और जनाब आते है जिन्हे हम ‘रूह’ भी कह सकते है. संगीत उतना ही बेहतरीन है जितने गुलज़ार और उनके शब्द.

कुछ दिनो पहले फिल्म पत्रकारिता कि एक व्याख्यान के दौरान अनिल चौबे सर ने कहा था कि बिमल रॉय , सत्यजीत रे आदी फिल्मकार ज्यादा बोलते नहीं थे. बोलते भी थे तो धीमे से. इनकी फिल्मे मगर बोलती थी और तेज़ आवाज़ में बोलती थी.

‘हैदर’ भी कुछ बोल रही है. जाइए. सुनिए. ज़रूरत है हमे सुनने की.

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