घर से मकान तक : विस्थापन की कहानी

जब तवा नदी के किनारे स्थित रिसॉर्ट से आप हाथों में चाय का कप पकड़े नदी की ओर देखेंगे तब ऐसा लगेगा जैसे इस से सुन्दर नजारा हो ही नही सकता। उस जगह की खुबसुरती आपके जीवन में चल रहे हर तनाव को दूर कर देगी। मगर प्रकृति का दिया हुआ तोहफा शायद हम मुठ्ठी भर लोगों के नसीब में ही होता है।

वही नदी जो हमारे लिए बहुत खूबसूरत है कई लोगों के लिए दुख का कारण भी है। तवा नदी में बने तवा डेम के चलते आसपास के 44 गांवों को वहां से सरकार ने विस्थापित कर दिया क्योंकि वे गांव डूब क्षेत्र के अंदर आ रहे थे। विस्थापन ने उन गांव के लोगों से उनके सालों पुराने घर ही नहीं छीने बल्कि उनके रोजगार के साधन भी छीन लीए।

विस्थापन की प्रक्रिया सिर्फ यहीं नहीं बल्कि मप्र के कई जगहों पर चल रही है। जब तवा डैम को पार करके आप मढ़ई गांव की तरफ जंगल के रास्तों से गुजरते हैं तो आपको एक छोटा सा स्कूल दिखाई पड़ता है। उस स्कूल के सामने दिखाई पड़ते हैं एक कतार में बने एक जैसे दिखने वाले छोटे-छोटे घर।

यह देख कर हैरानी जरूर होती है कि जंगल के भीतर ये घर अचानक कैसे प्रकट हो गए। पूछने पर मालूम चलता है कि ये 20-25 घर एक नए गांव के बसाए हुए घर हैं, जिसका नाम है नया घोड़ानार।  घोड़ानार गांव पचमढ़ी के पास स्थित एक गांव हुआ करता था जिसे प्रशासन ने उठाकर सतपुडा के जंगलों में रख दिया। यही कहानी नया परसापानी गांव और नया चूरना गांव की है।
वर्ष 2013 में इन तीनों गांवों का विस्थापन हुआ क्योंकि पचमढ़ी के जंगलों में इनकी मौजूदगी जानवरों के लिए खतरनाक साबित हो रही थी। वहां के फॉरेस्ट डिपार्टमेंट की तो कम से कम यही राय थी। उन्हें तुरंत वहां से हटाने के शुरुआत हुई और विस्थापन के बदले 10 लाख रुपए की राशी और पांच एकड़ जमीन देने का वादा।

अच्छी बात यह है कि प्रशासन ने वादा निभाया और गांव के हर परिवार के 18 वर्ष से ऊपर आयू के सदस्य को पैसे मिले और जमीन भी, लेकिन जिन लोगों से उनके बसे-बसाए घर और काम-काज छीन लिए गए क्या उनके लिए यह काफी था? जवाब मिलता है – नहीं ।

मान सिंह जो अब नया घोड़ानार में छोटी सी दुकान चलाते हैं। बहुत ही दुखी नजर आते हैं। उनका मन इस नए गांव में नहीं लगता है। वे बताते हैं, “हम सालों से वहां बसे थे। वहां रोजगार के दूसरे साधन भी थे। यहां सिर्फ ये दुकान है”।

ये पूछने पर  कि क्या उन्हें दस लाख रुपए नहीं मिले, वे बताते हैं, “पैसे तो मिल गए मगर उसमें से आधे से ज्यादा तो खर्च हो गए हमें जमीन के 20,270 रुपए देने पड़े। घर बनवाने की लागत ढाई  से तीन लाख रुपए आई और अब भी घर ठीक से नहीं बना। घर में दरवाजे और खिड़की अबतक नहीं लग पाएं हैं। दुकान लगाने में भी कुछ पैसे खर्च हो गए”।

मान सिंह ये जरूर मानते हैं कि इस नए गांव में उन्हें बिजली मिली है जो पुराने गांव में नहीं थी, लेकिन उन्हें देखने से यही मालूम पड़ता है कि बिजली उनके जीवन में कम ही रोशनी फैला रही है।

मान सिंह आगे बताते है कि, “दुकान से हम चार सौ से पांच सौ रुपए कमा लेते हैं जिसमें से दो सौ रुपए बचता है। इतने कम पैसों में कुछ नहीं होता। पूराने गांव में दूसरे साधन भी थे रोजगार के जैसे तेंदू पत्ता की बिक्री, लकड़ी बेचना जो यहां नही।“

नया घोड़ानार के शासकीय प्राथमिक पाठशाला की अध्यापिका से बात करने पर पता चला कि घोड़ानार, परसापानी के लोगों के साथ बिल्कुल न्याय नही हुआ।

उनका कहना है कि प्रशासन ने इन्हें 10 लाख रुपए देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी, परन्तु क्या कभी यह सोचा कि इन पैसों के खत्म होने के बाद ये कहां जाएंगे। पुराने गांव में खेती के लिए उपजाऊ जमीनें थी और दूसरे व्यवसाय थे जो यहां नहीं है। अगर प्रशासन और सरकार को इनके विकास की सही में चिन्ता थी तो जंगल के आगे ये गांव बसाने चाहिए थे ना कि पीछे।

पाठशाला में पढ़ रहे बच्चों से बातचीत करने पर पता चला कि वे दो साल तक नया घोड़ानार में पेड के नीचे ही पढ़े। अध्यापिका ने उनकी बात में जोड़ते हुए कहा, “इस पाठशाला की बिल्डिंग बिल्कुल नई है। हम दो सालों तक बिल्डिंग की मांग करते रहे मगर कुछ असर नहीं हुआ। फिर भी पेड़ के नीचे ही बच्चों को पढ़ाते रहे। अब जाकर यह बिल्डिंग बनी”.

नया घोड़ानार से कुछ ही दूरी पर बसा है नया चूरना गांव जिसके हालात कुछ ज्यादा अलग नहीं है। इस गांव की सड़कें थोड़ी चौड़ी और घर थोड़े बड़े नजर आएंगे। मगर लोगों के हालात वैसे ही जैसे हमने नया घोड़ानार में पाया।

इस गांव में तादाद यादवों की ज्यादा थी। इन्हें भी पांच एकड़ जमीन या 10 लाख रुपए देकर चलता कर दिया सरकार ने। ये पूछने पर कि वे कैसे दो सालों तक घर चलाते रहे तो उनके पास कोई जवाब नहीं था। जिस दिन पैसे खत्म हो जाएंगे, इनकी दिक्कतें दो गुना ज्यादा बढ़ जाएंगी।

नत्थू यादव जो नया चूरना गांव के निवासी हैं ने यह बताया कि उनकी जिंदगी जैसे रुक सी गई है और उन्हें मालूम नहीं कि आगे क्या करना है। जो जमीनें उन्हें घर बनाने को मिली आजतक उसका पट्टा उन्हें नहीं मिला। जिस घर में ये लोग रहते हैं वो सोलर लाइट सिस्टम द्वारा चलित है, जिसका बिल 500 रुपए तक आता है। जबकि सरकार ने वादा किया था कि पांच सालों तक इनके घर बिजली का बिल नहीं आएगा।

सबसे हैरान कर देने वाली बात यह थी कि कई घरों में अभी तक बिजली का काम भी नही हुआ और बिजली के उपयोग की कोई गुंजाइश ही नही है। मगर फिर भी उन घरों में बिजली के बिल आ रहे हैं।
पुराने चूरना गांव में पाठशाला आठवी तक थे जबकि नया चूरना में सिर्फ पांचवी तक ही है। इसके कारण वहां के बच्चों को अब बाहर पढ़ने जाना पड़ता है।

जमीनें तो हैं खेती करने के लिए जो सरकार ने उन्हें दी हैं, मगर उन जमीनों में पत्थर के सिवा कुछ भी नहीं उगाया जा सकता है।

आज मुद्दे की बात ये नहीं कि क्या इन गांवों का विस्थापन होना चाहिए था या नहीं। मुद्दे की बात यह है कि क्या विस्थापन पूरी तरह से हो पाया? क्या आप एक जंगल से दूसरे जंगल में चले जाने को सामाजिक न्याय मानते हैं?
गांव के लोगों को नए गांवों में मकान तो मिल गए, मगर उनके घर अभी भी पुराने गांव में हैं। उन्हें इन मकानों में अपने घर बसाने में कितना वक्त लग जाएगा, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है।

हम सरकार के साथ मिल कर बस ये आशा कर सकते हैं कि उनके दस लाख रुपए के खत्म होने के पहले ही उनके घर बस जाएं।

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2 Responses to घर से मकान तक : विस्थापन की कहानी

  1. manish mishra says:

    बहुत अच्छा लिखा आपने

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