लड़ाई जारी है: FTII

दो साल पहले अपने फाइनल प्रोजेक्ट के मैगज़ीन के लिए एक्टर जयदीप अहलावत का साक्षात्कार किया था। मै उस वक्त कोई पत्रकार नहीं था और न ही कोई एप्रोच थी। जयदीप को फेसबुक के जरिये कांटेक्ट किया और वह मान गए। उनका इतनी आसानी से मान जाना बताता है कि उनमे घमंड जैसी कोई चीज़ नहीं। उनसे बात करने पर पता लगा की वह कितने विनम्र और ज़मीन से जुड़े हुए है। आपको बताता चलू की ये वही जयदीप है जिन्होंने गैंग्स ऑफ़ वस्सेपुर में शहीद खान की भूमिका निभाई थी।

जयदीप से मैंने एक सवाल किया था की ऍफ़ टी आई आई (FTII) आपके जीवन में क्या महत्व रखता है? उन्होंने जवाब में कहा था कि ऍफ़ टी आई आई ने उन्हें एक अच्छा कलाकार बनने में ही नहीं बल्कि एक अच्छा इंसान बनने में भी सफल भूमिका निभाई है। ऍफ़ टी आई आई एक ऐसी जगह है जहां इस देश के सभी उभरते हुए कलाकार एकजुट होते है, चाहे वो एक्टर हो, एडिटर हो या लेखक। ये वो लोग है जो आगे चलकर ओम पुरी बने और राज कुमार हिरानी बने और हिंदी सिनेमा की आज भी सेवा कर रहे है।

उन्होंने आगे कहा की ऍफ़ टी आई आई सिर्फ इसलिए महान नहीं क्योंकि वहा सिनेमा के महान लोग पढ़ा रहे है। उस जगह में जादू है। वहा एक ऐसा माहौल बन जाता है जहा आपको सीखना आसान बन जाता है। वहा आप और अन्य लोगों की प्रतिभा, रचनात्मकता और जज्बा एक दूसरे को सीखाते है। ऍफ़ टी आई आई के हवा में ही ऐसा कुछ है।

जयदीप का यह जवाब गवाह है की ऍफ़ टी आई आई को लोग कितने सम्मान और आदर से देखते है।

मगर लगता है अब वहा की हवा को जिसमे प्रतिभा और रचनात्मकता का घोल था किसी की नज़र लग गयी है। ऍफ़ टी आई आई आज विवादों के घेरे में है। गजेन्द्र चौहान को ऍफ़ टी आई आई का चेयरमैन नियुक्त किया गया है। आपने इनका नाम कही नहीं सुना होगा। ऐसी कोई उबलब्धि नहीं इनकी। कुछ पुरानी हिंदी फिल्मो में यह साइड किक के भी साइड किक होते थे। जिस फ़िल्म में ये लीड थे उन्हें हम सरल भाषा में ‘सी’ ग्रैड फिल्में कहते है।

यहाँ चिंता का विषय यह नहीं है की एक कम काबिलियत रखने वाला इंसांन ऐसे प्रतिष्टित संसथान का चेयरमैन बनेगा। चिंता का विषय इसके पीछे छिपी हुई चाल है।

एक साल के अंदर आरएसएस से ठेका ले चुकी इस सरकार ने जिस तरह से हर संस्थानों में अपने लोगो को घुसाया है, उसे ध्यान मे रखते हुए गजनेद्र चौहान की नियुक्ति एक बड़ा सवाल उठाती है। गजेन्द्र चौहान भाजपा सदस्य है और मोदी भक्त। और यही कारण है खतरे का।

ज़्यादा खतरनाक होता अगर ऍफ़ टी आई आई के स्टूडेंट्स इस फैसले का विरोध नहीं करते। दरअसल हम विरोध करना भूल गए है। गलत को आँख बंद कर के और कान बंद करके सहते जाना सबसे बड़ा पाप है। ऐसे वक्त में ऍफ़ टी टी आई में विरोध प्रकट होना एक सफल शुरुआत है।

आज के समय में इंडियन कौंसिल ऑफ़ हिस्टोरिकल रिसर्च, एन सी आर टी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यलाल जैसे संस्थानों में भाजपाई और आरएसएस के लोग बैठ चुके है। अगर ये अच्छे उद्देश्य से काम करने बैठते तो किसी विरोध की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। लेकिन जो कुछ मैंने खुद माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय में देखा की कैसे ये भक्त शिक्षा प्रणाली के साथ खिलवाड़ कर रहे है, इनपे भरोसा बना पाना नामुमकिन है।

ये लोग हर जगह अपने चट्टे-बट्टे बैठ देना चाहते है जो की सिर्फ इनकी कही सुने। जहा असहमति की कोई जगह न हो। सिर्फ एक ही आवाज़ हो और जहा सिर्फ एक ही विचारधारा को आपके अंदर ठेला जाए। चाहे अब इतिहास की किताब पढ़े, पत्रकारिता की पढाई करे या फ़िल्म देखे। आने वाली पीढ़ी के पोलिटिकल ओरिएंटेशन के साथ खिलवाड़ करना चाहते है ये लोग।

कला के साथ ये खिलवाड़ बहुत बुरे परिणाम ला सकता है। कला खुद में एक हथियार रहा है विरोध प्रकट करने का। चीज़ों को सामने रखने का। जब ‘हैदर’ पर्दे पर आई तो फ़िल्म के कंटेंट को लेकर चिंता हुई। अलग अलग विचार निकले। कोई हैदर के समर्थन में था तो कोई विरोध में। खूब बहसे भी हुई। ऐसी बहसे हमारे समाज के लिए बहुत बड़ा महत्व रखती है। ये बताती है की यहाँ सबको अपनी बात रखने का अधिकार है। हैदर ने एक गम्भीर मुद्दे  में जान फूंक दी और पब्लिक के बिच इसपे चर्चाये हुई। शायद यही कला की ताकत है।

सेंसर बोर्ड और ऍफ़ टी आई आई जैसे तमाम जगहों पर इन भक्तो का बैठना अकेले कला का ही दम नहीं घोटेगा, हमारा और आपका भी नुक्सान होगा।

मै अंत में फिर वही कहूँगा जो कहता हु। मै नहीं चाहता आप तुरंत मेरी बात मान ले। नहीं। मै चाहता ही आप इस बहस का हिस्सा बने और बहस के बिच में रहे न की कोने पर। इसके बारे में पढ़े और अपनी राय बनाये। लिखे।

धन्यवाद।

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A sincere child of an insincere world.
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