कम्बल का कवर

 

उन दिनों हर रात अजीब ही होती थी. मगर वो रात ज्यादा अजीब थी. थक हारकर अपने रूम पर कभी एक तो कभी दो बजे रात में पहुचता था. कुछ भी नया करने को नहीं बचा था. वही रात को देर तक सोना या फिर यूँ  कहू कि सुबह जल्दी सो जाना. दोपहर तक उठना. खाना बनाना. उसे किसी तरह खाना. और फिर शाम को दफ्तर निकल जाना.

बस में बैठकर दफ्तर जाते वक्त सिर्फ यही ख्याल आता था की मैं इस प्रोफेशन में आया ही क्यों. फिर ये अहसास होता की शायद मैं और कुछ कर भी नहीं सकता था. इसीलिए पत्रकार बन गया. पांच साल में जिस सोच के साथ पत्रकारिता में आया था, आज उस सोच से बहुत दूर आ चूका था.

ये सवाल मेरे अन्दर पिछले कई दिनों से दौड़ रहा था. परेशान भी करता था. मगर मैं खुश नसीब था  की ज़िन्दगी में सिर्फ यही नहीं था परेशान होने के लिए. परेशानियो का भण्डार था. ज्यादा परेशानियां जब हो तो सही रहता है. दुःख ज्यादा देर तक एक जगह टिक नहीं पाता. जब दुःख एक जगह ज्यादा देर तक टिक जाए तो बर्दाश्त के बहार चला जाता है.

माँ का शुगर का पारा बढ़ता ही जा रहा था. ३०० पार कर चुका था. उनकी दवाई भी महँगी हो रही थी. ये दवाइयां इतनी महँगी कैसे हो रही थी. यही सोचकर दफ्तर से रूम तक का ६ किलोमीटर का पैदल सफ़र कट जाता था. भोपाल जल्दी सोने वाला शहर था. रात को बस नहीं मिलती थी. दो पहिया लेने के लिए पैसे नहीं थे. उस वक्त मगर इतनी परेशानिया थी ज़िन्दगी में कि रात को रूम तक के सफ़र के लिए कुछ न कुछ तो सोचने के लिए मिल ही जाता था.

उस रात सर्दी भी ज्यादा थी. दिसंबर में पारा इतना नहीं गिरता था भोपाल में. मैं ठिठुरता हुआ रेलवे ओवरब्रिज तक पंहुचा जहा से मेरा रूम महज़ कुछ कदम पे था. कुछ कुत्ते सोये हुए रहते थे वहां जो मेरे चहलकदमी से उठ जाते थे. ये देखने के बाद कि ये तो वही आदमी है जो रोज़ यहाँ से गुज़रता है, अपनी नींद में वापस चले जाते.

मगर आज का दिन कुछ नया था. ब्रिज के किनारे पर एक बुढा मौलाना बैठा तकिये और कम्बल के कवर बेच रहा था. रात के एक बजे ये दृश्य देख कर मैं हैरान रह गया.

मुंह में एक बीड़ी फसाए. माथे पर मुहासे लिए. एक पतली सी चादर ओढ़े, तकरीबन ७० साल की उम्र वाला एक बुढा मुसलमान. मैं एकदम से थम सा गया था. पूछना चाहता था की इतनी रात को वह कम्बल के कवर बेचने क्यों बैठा था. कौन खरीदने आता उसके कवर. मैं पुछ नहीं पाया मगर. शायद जवाब मेरे पास था.

थोडा और नज़दीक गया तो उसका चहरा साफ़ दिखने लगा. चहरे पर पड़ी सिलवटे. जैसे कोई चित्रकार रोज़ उनपर ब्रश फेर जाता हो. आँखों में पीलापन. और पीलेपन के अन्दर झलकता संघर्ष, पता नहीं बीते कितने सालो का. फटे होंठो के बीच फसी बीड़ी. वही बुढापन.

उसे ऐसे लगातार देखते रहना मुझे सही नहीं लगा. मैं उसकी आवाज़ सुनना चाहता था. ये नहीं पता क्यों. बस सुनना चाहता था.

मैं आगे बढ़ा और कम्बल के कवर के दाम पूछा.

“१५० का एक है. १०० में लगा दूंगा.”

उसकी आवाज़ अनजानी नहीं लगी. ज़िन्दगी भर बीड़ी के धुंए और धुल को घोट घोट के जब गला आवाज़ निकलाता है तो ऐसी ही आवाज़ निकलती है.

“कुछ ज्यादा नहीं बोल रहे दाम.”

“पहले ही बताया १५०. ४०० बोल के १५० में बेचता तो ले लेते. फिर भी १०० का लगा दिया.”

ये बोलकर उसने मुझे बता दिया की उसे दुकानदारी आती थी.

मेरे बैंक के खाते में सिर्फ २५०० रुपये थे. जिसमे से १५०० माँ की दवाइयों में लगने वाले थे. मैं पिछले दो हफ्ते से उनकी दवाई खरीदने की बात को टाल रहा था. मन में गुस्सा था की रवि आखिर कब तक माँ की तबियत और मेरे हालातो को समझने से कतरायेगा. रवि मेरा बड़ा भाई था जो अब दिल्ली में नौकरी कर रहा था. कुछ दिनों पहले तक हम दोनों ने माँ के इलाज के खर्चे उठाये. छह महीने पहले उसे लगा की माँ का बचना अब मुश्किल है. एक कान से बहरी हों गयी थी वो. दिखना भी अब कम हो रहा था. उसने कभी ये नहीं बोला अपने मुंह से कि कभी पैसे नहीं भेजेगा. फिर भी ये बात मुझ तक पहुच गयी थी.

पिछले छह महीनो से इलाज का खर्चा मैं संभाल रहा था. दो हफ्ते पहले मैंने भी सोच लिया था कि इस महीने की दवाइयां  मैं नहीं खरीदूंगा. इन दो हफ्तों में शुक्ल जी का दस बार फ़ोन आया होगा. शुक्ल जी गाँव में हमारे पड़ोसी थे और माँ की दवा वही ला कर उन्हें दिया करते थे. रवि को फ़ोन पे ढेरो सन्देश भेजे की इस महीने के दवा के पैसे शुक्ल जी के खाते में डाल दे. ‘हां बस अभी डालता हूँ’ – उसका जवाब आता. पैसे मगर नहीं आते.

कम्बल का कवर १०० रुपये का था. ऐसी गंभीर आर्थिक स्थिति में कम्बल का कवर खरीदना ठीक वैसा ही होता जैसा भुखमरी के हालत में देशों का बम और बारूद खरीदना. वे फिर भी बम- बारूद से कुछ न कुछ कर लेते है, मैं इस कम्बल का क्या करता.

मौलाना मुझे बस ताक रहा था. कुछ बोला नहीं. उस वक्त मेरा आगे बढ़ जाना उस बूढ़े मौलाना की हार होती. पता नहीं कितनी बार वो इस हार का सामना कर चुका होगा. मैं शायद ज्यादा ही भावुक हो रहा था. मेरी माँ और दोस्त भी यही कहा करते थे. मगर मैं ऐसा ही था.

मैंने मन को फिर भी मजबूत किया. पैसो की सख्त ज़रूरत थी उस वक्त. एक-एक पैसा कीमती था.

रूम पर पहुचते ही फ़ोन निकाला और शुक्ल जी को सन्देश भेजा.

“आप कल माँ की दवाइयां ले आइयेगा. कल पैसे डाल दूंगा.”

फ़ोन को जब बिस्तर पर फेंका तो देखा की चादर बेहद मैली हो चुकी थी. पिछले कई दिनों से उसे धोने की बात को टाल रहा था. फिर ध्यान आया की कम्बल का कवर भी तो मुलायम ही होता है. उसे भी तो बिछाया जा सकता है बिस्तर पर. दफ्तर वाला बैग खोला. कवर को निकाला. सच में मुलायम था. उस रात अच्छी नींद आई थी.

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