दिल्ली के ढाई साल ले कर

“तुम्हे रात में नींद क्यों नहीं आती है?”

“पता नहीं”

“कब लौटे हो ऑफिस से?”

“अभी आधे घंटे पहले.”

“खाना खाए?”

“हाँ, खा लिया.”

“मुझसे नहीं पूछोगे की नीतू, खाना खाई की नहीं?

“हम्म”

“हम्म क्या?”

“मुझे पता है कि तुम खा चुकी होगी.”

“फिर भी पूछना तो चाहिए न. मैंने भी तो पुछा.”

हम दोनों फिर ५ मिनट तक चुप रहे. कोई कुछ नहीं बोला. रोज़ फ़ोन पे हम दोनों किसी न किसी बात के ख़त्म होने पे यूँही रुक से जाते थे. ये ऐसा वक्त होता था जब मैं नीतू से बात करना भी चाहता था और नहीं भी. नफरत सी थी मुझे इस वक्त से.

“तो मैं फोने रखूं?”

“क्यूँ?”

तुम कुछ बोल नहीं रहे हो इसलिए.”

“ह्म्म्म”

“फिर हम्म. जब कोई बात करनी ही नहीं होती तो फ़ोन क्यों करते हो?”

“पता नहीं.”

“यार हद्द है. केशंव, तुम्हे पता है आज मैं कितना थकी हूँ. सुबह चार बजे की उठी हुई हूँ. पचास सामान खरीदने थे आज. ऊपर से घर का काम. बाई भी नहीं आई आज. शाम को मम्मी को डॉक्टर के पास भी ले गयी. पता नहीं अब कौन उन्हें डॉक्टर के पास ले जाया करेगा. तुम्हे क्या पड़ी है. बस ऑफिस से रूम आते हो, थोड़ी याद आई और फ़ोन घुमा दिए.”

“और तुम्ने पहले ही रिंग में उठा भी लिया. इंतज़ार कर रही थी मेरे फ़ोन का?”

“हाँ, कर रही थी. तो? ना करू? मैं सिर्फ उस वक्त किसी को याद नहीं करती जब फ्री रहू.”

“एक मेसेज ड्राप कर देती फ़ोन पे.”

“क्यूँ? क्यूँ करती मेसेज ड्राप? इसलिए ताकि तुम ये बोलो कि रूम पे पहुच के फ़ोन करता हूँ. मुझे अपना खून नहीं खौलाना था.”

“इसके बाद हम दोनों फिर चुप हो गए. या फिर नीतू की माने तो मैं चुप हो गया था. अक्सर ऐसा मैंने हम दोनों के बीच होते देखा था. जब भी बहुत कुछ कहने को दिल करता था, हम दोनों चुप हो जाते थे.

“नीतू?”

“हम्म.”

“हो न?”

“हाँ”

“ठीक है.”

“क्या ठीक है यार? क्या ठीक है?”

“फ़ोन रखना है? नींद आ रही है तुम्हे.”

वो फिर चुप हो गयी.

“सुनो, नीतू!”

“बोलो.”

“मत जाओ.”

फिर से चुप्पी. लम्बी चुप्पी.

पिछले ढाई साल से हम एक शहर में थे. यहीं प्यार हुआ था. दिल्ली. सबके लिए धुंए में घुटता शहर. हमारे लिए मोहब्बत में चलता शहर. लेकिन अब नीतू जा रही थी. ट्रेन पकड़ के. मुंबई. सपनो का शहर. किसी शहर से आज तक मैंने इतनी नफरत नहीं की थी जितनी उस वक्त मुंबई से कर रहा था. कभी भी नहीं सोचा था की नीतू एक दिन किसी दूसरे शहर चली जाएगी.

यहीं दिल्ली में हमने साथ पढाई ख़त्म की. हमारी नौकरियां भी यहीं लगी. मुझे तो हमेशा से यही लगता रहा की हम दोनों हमेशा साथ ही रहेंगे.

“केशव, आखिरी बार कब मिले थे तुम मुझसे?”

“शायद ९ को……”

“शायद?”

“हाँ, ९ को ही.”

“तुम्हे याद करना पड़ रहा है.”

“बहुत दिन भी तो हो गए.”

“वही. बहुत दिन हो गए. लेकिन कितने?”

“आज क्या है? २५ हो गयी आज…….”

“हाँ. पूरे १६ दिन. एक शहर में रहते हुए भी इतने दिनों बाद मिलते है. और मिलते भी है तो कहाँ. राजीव चौक स्टेशन पर. वो भी एक घंटे के लिए. जिसमे  से २० मिनट हम लोगो को सिर्फ ये बताते है कि गुडगाँव की मेट्रो कहा से मिलेगी और नोएडा की कहा से. तो फिर क्या फर्क पड़ता है, यार अगर जा रही हूँ तो.”

“फर्क पड़ता है. मुझे पड़ता है. “

“कुछ फर्क नहीं पड़ता, केशव, कुछ फर्क नहीं पड़ता. मेरा ऑफिस ग्रेटर कैलाश, तुम्हारा नोएडा. मेरा घर विकासपुरी. तुम्हारा करोल बाग. तुम उधर से लौटते हो. मैं इधर से. दोनों थके हुए. मिलने का मन हो भी तो मिलने का मन नहीं करता. वक्त कहा रह गया हमारे पास. अब सिर्फ वाट्सऐप के मेसेजेस है.”

एक सांस में उसने जो कुछ बोल दिया वो सब सच था. हमारे पास वक्त ही नहीं रह गया था एक दूसरे के लिए. पिछले ६ महीने से नीतू और मुझे कोई चीज़ अगर अभी तक जोड़ी हुई थी तो वो था हमारा बहुत गहरा प्यार.

“मुझे बस ये बात तसल्ली देती है की तुम इस शहर में हो. किसी भी वक्त तुमसे जा के मिल सकता हूँ. ये अहसास ही काफी लगता है. दिलासा देता है कि बस तुम हो इसी शहर में. आज नहीं तो कल मिल लूँगा. कल नहीं तो परसों. तुम चली जोओगी तो ये अहसास भी चला जाएगा. ये पछतावा भी रहेगा कि जब-जब तुमसे मिलने की सोचा, उस वक्त तुमसे मिलने क्यूँ नहीं गया.”

“क्यूंकि तुम ऑफिस में पी पी टी बना रहे होते थे. हा हा हा हा हा.”

वो हस देती थी. वो हस देती थी जब उसे लगता था की अब कुछ बोल नहीं पाएगी. बोल नहीं पाएगी और रो देगी. वो हस देती थी. और उस हसी के बाद बस चुप गयी.

“मत जाओ.”

“बच्चो जैसी बातें मत करो. जाना ज़रूरी है. यहाँ जॉब छोड़ दी है. वहा भी ज्वाइन न करू. कुछ दिनों की बात हैं.”

“मैं कल स्टेशन नहीं आऊंगा.”

“मैं यही कहने वाली थी. मत आना.”

“तुम क्यूँ इतना दिखावा करती हो स्ट्रांग बनने का?”

“अब तुम भी सीख लो.”

“मैं चालू साथ? छुट्टी ले लेता हूँ.”

“नहीं, केशव. बिलकुल भी नहीं. मम्मी पापा आएँगे स्टेशन छोड़ने. तुम बस आना मत.”

मैं कैसे नहीं जाता. बस उसको बताया नहीं. मैं कैसे न पहुचता. उसे भी पता था. अपनी माँ के गले लग के रो रही थी. मेरे सामने नहीं रोती थी. बहुत स्ट्रांग बनती थी. वहां रो रही थी. उसे ये तो नहीं पता था की मैं देख रहा था मगर ये अहसास था की मैं वह हो सकता हूँ. ट्रेन चल दी. पता नहीं क्यूँ मगर बुरा नहीं लगा तब. जैसे ही उसका डब्बा मेरे सामने से गुज़रा और उसने देखा मेरी ओर. तब बुरा लगा. क्यों देख लिया मैंने उसको. लेकिन नीतू. नीतू, नीतू थी. २० मिटर के दूरी रही होगी हम दोनों के बीच मगर तब भी उसे लगा की मुझे स्ट्रांग बन जाना चाहिए. आंसू सोख लिए उसने. मुझे देखी. मुस्कुराई. हाथ हिलाई, बाय करने के लिए. और चली गयी. दिल्ली के ढाई साल ले कर.

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A sincere child of an insincere world.
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2 Responses to दिल्ली के ढाई साल ले कर

  1. सुंदर 🙂

  2. Akhilesh says:

    Wah.!!

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