हरामी और बेवकूफ: एक विचार

 

इंसान सिर्फ दो नसल के होते है. एक होते है हरामी और दुसरे बेवकूफ. और ये सारा खेल इन्ही दोनो  के बीच का है. गैंग्स ऑफ़ वासेपुर का ये डायलाग मेरा सबसे फेवरेट डायलाग है.

ये लाइन इतनी गहरी है कि आप इससे मुंह फेर ही नहीं सकते. मैं अगर अपने आप को ठीक से समझता हूँ तो मैं बेवकूफों की श्रेणी में आता हूँ. बचपन से आज तक, कटता रहा है मेरा. खुद का ये रिव्यु कभी- कभी धोखा भी लगता है मगर. ये बात बाद में बताऊंगा की क्यूँ.

बेवकूफ क्यों समझता हूँ ये पढ़िए.

जब बचपन में हरामियों के बीच खेलता था तो वो बेईमान साले बेईमानी से आउट कर देते थे. मुझे पता होता था की मैं आउट नहीं था मगर फिर भी कुछ बोल नहीं पाता था. जैसे ब्राह्मणों में भी सब- कटेगरिज़  होती है, बेवकूफों में भी होती है. और मैं उनमे अपने आप को अवल नंबर पर पाता था. बल्ला हाथ में लिए, मुंह लटकाए वापस आ जाता था. स्कूल में भी यही हाल था. जब मेरे बगल में बैठा मेरा दोस्त चाक फेक के मैथ्स के टीचर के कुल्हे पे मारता था उसके बाद समझ आया की हरामीपना क्या होता है. टीचर जब पीछे मुड़ के देखता तो मुझे उसे घूरता हुआ पाता. मैं बगल में अपने दोस्त को देखता तो वो निचे मुंडी किये अपना सवाल हल कर रहा होता. क्लास के बहार हाथ खड़ा किये हुए मैं बस यही सोचता की मैं कितना बड़ा बेवकूफ हूँ.

कॉलेज में, दफ्तर में. हर जगह मुझे यही लगता रहा की मैं बहुत बड़ा बेवकूफ हूँ.

मगर मैं गलत था. हम सबका एक ब्लाइंड सेल्फ होता है. ये कम्युनिकेशन की पढाई में पढाया जाता हैं. ब्लाइंड सेल्फ मने ऐसी चीजे आपके अन्दर की जो आपको नहीं दिखती मगर दूसरो को दिखती हैं. इसीलिए उसे ब्लाइंड सेल्फ कहते है. हमारे अन्दर का हरामीपना हमारा ब्लाइंड सेल्फ है. हम अपने अन्दर के हरामी को कभी देख नहीं पाते. जैसे की मेरे क्रिकेट वाले दोस्त और मेरे डेस्क में बागल में बैठने वाला दोस्त. मुझे हमेशा लगता रहा की वे हरामी है. मगर उन्हें ऐसा कभी अपने बारे में लगा हो ये कहना मुश्किल है.

इसी तरह मैं भी कभी ना कभी हरामी ज़रूर हुआ रहूँगा. कब था ये पता नहीं. ये मेरे दोस्त और जो साथ में है वो बता सकते है. हमें अपने अन्दर का हरामी नहीं दीखता, दूसरो के अन्दर का जरुर दिखता है.

हम एक ही सांस में अपनी ज़िन्दगी नहीं जीते. हम हिस्सों में अपनी ज़िन्दगी जीते है. कभी बेवकूफ रहते है, कभी हरामी. यहाँ कोई एक आदमी ऐसा नहीं जो की सिर्फ बेवकूफ हो या सिर्फ हरामी. वो कभी बेवकूफ रहा, कभी हरामी बन गया. ये बात पियूष मिश्र ने भी अपने ढंग से कही.

आपकी ज़िन्दगी का सच क्या है यह बात तय करती है की आप कितने हिस्सों में बेवकूफ रहे और कितने हिस्सों में हरामी. कुछ पल ऐसे भी होते है जब एक वक्त में आप दोनों होते है. उदाहरण के तौर पे जब एक अज्ञानी फेसबुक पे ज्ञान पेल रहा होता है, उस वक्त वह बेवकूफ और हरामी दोनों होता है. उसका ब्लाइंड सेल्फ क्लियर होता है. उस हरामी को कुछ नहीं दिख रहा होता.

उदाहरण में थोडा और घुस जाते है. जैसे की मुझे ले लीजिये (ये याद रखिये की सारे उदाहरण आप से ही शुरू होते है, अच्छा या बुरा, दोनों ही). मुझे नहीं पता था कि जे एन यू में कौन से नारे लगे. जो टी वी पे दिखाया गया मैंने उसे अपने अन्दर उतार लिया. वो मेरा बेवकूफ होना था. दीपक ने मेरा काट दिया था. मैं बड़े आसानी से एक जजमेंट पे पहुच गया. मगर जैसे ही मैं फेसबुक पे अपने विचारो का समंदर लेके पंहुचा और कन्हैया को बहन और माँ की गाली दी, मैं हरामी हो गया. मुझे उसक वक्त पता ही नहीं था की मैं हरामी हूँ. मुझे तो दुनिया का सबसे बड़ा हरामी कन्हैया कुमार और उसके साथी लग रहे थे.

सोचिये, सुधीर ने मेरी बेव्कूफी का फायदा उठाकर मुझे हरामी बनने की और धकेल दिया.

अगर रिसर्च करे तो शायद पता लगे की हमारी नैतिकता बेवकूफों की और झुकी रहती है, क्यूंकि बेवकूफ हमे हरामी से सही लगते है. मगर मुझे लगता है की हरामी एक बड़ी ही साफ़ इमेज है और हरामी जो होते है वे बहुत इमानदार होते है. और ये सभी पे अप्लाई होता है. आप पर, मुझ पर, वो जो आधा पढ़ के भाग गया उस पर भी. इस वक्त आप उसको क्या बोलना चाहेंगे ये आप पे डीपेंड करता है.

हमारे नेताओं को ही देखिये. २००४ से २०१४ तक जो हमारे प्रधानमंत्री थे या तो वह बेवकूफ थे की इस दौरान हुए सभी घोटाले उनके नाक के नीचे हुए और उन्हें पता नहीं लगा या फिर वे इतने बड़े हरामी थे की सब जानते हुए भी इगनोर कर दिए. और मध्य प्रदेश में हमारे मामा को ही लीजिये. व्यपाम जैसा बड़ा घोटाला और भाई साहब को कोई फरक ही नहीं पड़ा. क्या कहेंगे उनके लिए? हमारे मोदी जी को ही लीजिये न. चलिए छोडिये उन्हें रहने देते है. उनका उदाहरण पेश करना बहुत बड़ी बेवकूफी होगी और कुछ लोग मुझे खामखाँ हरामी समझ लेंगे.

तो बॉस! बात बस इतनी सी है कि आज तक हम खुद को बहुत भोले लगते रहे. अपनी साफ़ छवि में जीने की आदत रही है हमे. लेकिन अगर हमे पता लग जाए की हम हरामी भी है तो शायद दुनिया बदल जाएगी.

अंत तक पढ़े, उसका शुक्रिया. चलिए मुझे जज करना शुरू करिए.

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About ishubhampandey

A sincere child of an insincere world.
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