कठिन

सुबह-सुबह बंटी को स्कूल जाते देख कर बहुत अच्छा लगता था. उसकी सफ़ेद शर्ट और नीली पेंट खूब जचती थी उस पर. क्योंकि मैं भी उसी वक्त निकलता था घर से, तो मैं भी उसी के साथ ही चल देता था. हम दोनों अच्छे दोस्त थे. एक ही उम्र के होने के कारण हमारी बाते भी एक जैसी ही होती थी. अक्सर बंटी ही बोला करता था. मैं बस सुनता था. रास्ते भर वो अपने स्कूल में घटी घटनाओं के बारे में बताता. कितनी सारी स्कूल की कहानियाँ थी उसके पास. जैसे स्कूल बस उन्ही कहानियों के लिए जाता हो. 

वो बताता कि कैसे रघुनाथ सर जो उसे हिंदी पढ़ाते थे, हर वाक्य के ख़त्म होने पर हिचकी लेते थे और फिर अटक से जाते थे. मैं रघुनाथ सर के बारे में फिर सोचने लगता. कैसा मुंह होगा उनका और कैसे लगते होंगे हिचकी लेते वक्त. शायद वह खुद उस वाक्य का मतलब समझने की कोशिश करते होंगे. जाने क्यूँ ये सब बाते बहुत उत्साहित करती थी अन्दर मुझे.

बंटी बताता था कि कभी- कभी उसे सज़ा भी मिलती थी. क्लास के बहार खड़ा होने की सजा. वो और उसके दोस्त उस सजा का बहुत मज़ा लिया करते थे. क्योंकि पढाई से बचने का इससे ज्यादा अच्छा कोई और तरीका नहीं था.

ये सब बात करते कब हनुमान चौराहा आ जाता था हमे पता ही नहीं चलता था. बंटी वहां से सीधे निकल जाता और मैं बाई तरफ अपनी चाय के टपरी पर.

जब भी उसे क्लास में अच्छे अंक मिलते थे, वह मेरे हाथ की चाय पीने आता था. उसकी आदतें मेरे जैसी ही थी. खूब चाय पीता था और लड्डू खता था.

एक दिन उसके साथ उसकी एक दोस्त भी आई. बंटी के चहरे पर एक अलग ही लाली थी उस दिन. मैं बर्तन मांजते-मांजते रुक सा गया था. बंटी ने मेरी और इशारा किया. मैं हाथ धोकर मैगी बनाने चला गया. मेरी नज़र मगर उन पर ही टिकी थी. मैगी जब उनके टेबल पर रखी तो इस उम्मीद के साथ कि बंटी मुझे अपनी दोस्त से मिलवायेगा मगर ऐसा उसने किया नहीं.

वह कुछ भी नहीं बोला और दोनों खाने लगे. मैं वापस आकर बर्तन मांजने लगा.

अगली दोपहर जब बंटी मिला तब मैंने उससे पूछा कि वो दोस्त कौन थी उसकी? उसने ठीक से जवाब नहीं दिया. मुझे ऐसा अहसास हुआ कि शायद वो नहीं चाहता कि मैं उसका दोस्त बनू. या फिर ये हो सकता था कि वो किसी को बताना न चाह रहा हो कि वो मेरा दोस्त था. उस दिन के बाद से बंटी का मेरी टपरी पर आना भी कम हो गया. एक दिन तो वो ऐसा गायब हुआ की एक महीने तक नहीं दिखा. मुझे उसके स्कूल के किस्से बहुत याद आने लगे थे. चाय बनाते वक्त मैं सिर्फ यही सोचता रहता की उसके स्कूल में अभी क्या हो रहा होगा. रघुनाथ सर ने कितनी बार अब तक हिचकियाँ ली होंगी. शायद बंटी इस वक्त अपनी क्लास के बहार खड़ा हो मस्ती करा रहा होगा.

एक महीने बाद बंटी चाय पीने लौटा. बहुत खुश दिख रहा था. कपड़े भी उसके नए लग रहे थे.

“कहाँ थे इतने दिन?

“अरे, एग्जाम आ गए थे और फिर गर्मी की छुट्टियों में दादी के घर चला गया था.”

मुझे बड़ा अजीब लगा ये सुन कर. ये गर्मी की छुट्टियाँ क्या होती है? मैंने तो आजतक सिर्फ होली की और दिवाली की छुट्टियों के बारे में सुना था. और दादी के घर जाना क्या होता था? मेरा तो पूरा परिवार एक साथ रहता था गाँव में. बाऊजी, अम्मा, छोटी, बड़क भैया, बाबा और मइया और सब.

बंटी ने बताया की स्कूल में गर्मियों के मौसम के आते ही एक महीने की छुट्टी हो जाती है. ये महीने बहुत गरम होते है इसलिए इनमे पढाई नहीं होती. ये सुनकर मैं दंग रह गया. गर्मी के बढ़ने से छुट्टी मिल जाना कितना अच्छा आईडिया है. मेरे मालिक को आजतक ये आईडिया क्यों नहीं आया? ऐसे तो मैं गाँव कितने लम्बे समय के किये जा सकता हूँ.

वैसे भी मुझे घर गए कितना वक्त हो गया था. और अब तो बरसात आने वाली थी. अब कहाँ से मिलती गर्मी की छुट्टियाँ.

“अच्छा सुनो, आज मेरा जन्मदिन है. मेरे सारे दोस्त घर पे आएँगे. तुम भी आना.”

“मैं? मैं कैसे आऊंगा?”

मुझे अन्दर ही अन्दर ख़ुशी थी कि बंटी मुझे भूला नहीं था.

“तुम्हे आना पड़ेगा. तुमने मुझे बहुत चाय पिलाई है.”

“मैं कोशिश करूँगा.”

बंटी मुस्कुराया और चला गया. मैं शाम को जब अपने रूम पर लौटा तो देखा की कोई भी ढंग का कपड़ा नहीं था पार्टी में जाने के लिए. अन्धो में काना राजा टाइप एक शर्ट मिली पहनने के लिए. और एक जीन्स. दौड़ के बगल वाली दूकान से शैम्पू का पैकेट लेके आया. शरीर में जितना मईल था सब रगड़ के निकाला. तैयार होकर बंटी के फ्लैट के नीचे पहुच गया. सांतवे माली पर घर था उसका. लिफ्ट थी मगर चलाने में डर लगता था. इसलिए सीढ़ी से ही सांतो माला चढ़ गया. जो मुंह पर क्रीम रगड़ी थी पसीने में घुल कर बह गयी थी. घंटी बजाई. बंटी के पापा ने दरवाजा खोला.

“हाँ, क्या हुआ?”

“जी..अंकल ….बंटी ने बुलाया था.”

“बंटी ने…”

ये सब सुनकर थोडे चौंक से गए वो.

“क्यों?”

“उसका जन्मदिन है न….इसलिए…शायद इसलिए.”

वह थोडा और चौंके. फिर मुझे वही खड़े रहने का बोल कर अन्दर चले गए.

तकरीबन आधे घंटे खड़े रहने के बाद, मैंने वापस लौटने की सोची. जैसे ही सीढ़ी पर पहला कदम रखा, दरवाजा फिर से खुला. अंकल की आवाज़ आई.

“अरे सुनो, माफ़ करना. मैं अन्दर बंटी से पूछने गया था कि उसने तुम्हे बुलाया है की नहीं. उसी वक्त केक कटने लगा और फिर मेरे दिमाग से उतर गया कि तुम बहार खड़े हो.”

मैं अब और भी शर्मिंदा हो गया था. ये सोचकर शर्म सी आने लगी की बंटी के पापा जब दरवाजा खोल रहे होंगे तो ये सोचे होंगे की शायद वो लड़का अब तक चला गया होगा. मगर उनको वही खड़ा मिला. यही सोचे होंगे की खाने के लिया आया है ये.

उस रात कमरे पर आकर सो नहीं पाया था. अगले दिन काम पर भी नहीं गया. दरअसल, अगले एक हफ्ते तक नहीं गया था काम पर. एक अजीब सी खलबली थी अन्दर. उसके एक हफ्ते बाद मैं गाँव लौट गया. वापस लौटेते वक्त ये सोचा था की अगली बार जब दिल्ली आऊंगा तो चाय बेचने नहीं, कुछ बड़ा करने. एक बड़ा सपना ले कर आऊंगा.

छह महीने बाद मैं दोबारा दिल्ली आया. अपने चाचा के साथ. एक कार की फक्ट्री में काम करने के लिए.

Advertisements

About ishubhampandey

A sincere child of an insincere world.
This entry was posted in Uncategorized. Bookmark the permalink.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s