इम्तियाज़ नहीं आये

ये सब करना मेरे लिए बहुत मुश्किल था. अपने समाज को धोखा दे रही थी मैं. एक ऐसे आदमी के लिए जो उस समाज का नहीं था. बाद में मुझे मालूम हुआ की समाज की परिभाषा होती क्या है.

मैंने सिर्फ इम्तियाज़ से प्यार किया था. कुछ जानते हुए या न जानते हुए नहीं. बस कर लिया था. हो गया था. उनकी कविताओ ने मेरे अन्दर घर कर लिया था. मैं उनसे मिले बगैर और उन्हें सुने बिना रह नहीं पाती थी.

मुझे आज भी याद है जब वे पहली बार कॉलेज के फेस्टिवल में स्टेज पर चढ़े थे. एक पतला – दुबला आदमी. सफ़ेद शर्ट और नीली पेंट पहना हुआ. पोएट्री राउंड में सबसे आखरी नाम. जहाँ सब रोबर्ट फ्रॉस्ट बनने आये थे, इम्तियाज़ अपना आइना खुद साथ लिए. वो डरे हुए थे. मैं देख सकती थी. मुझे आज भी यकीं नहीं होता की उस घबराए हुए इंसान से मुझे कैसे प्यार हो गया. क्या प्यार तब हुआ जब उन्होंने कविता सुनाना शुरू किया या फिर तब ही हो गया था जब वो घबराते हुए स्टेज पर चढ़ रहे थे.

बीस लोगो ने उस दिन कविता सुनाई थी. सब एक से एक थी. फिर भी पता नहीं क्यों लगा जब इम्तियाज़ स्टेज पर चढ़ रहे थे कि वो अलग है. उनकी कविता सबसे अलग होगी.

कविता शुरू करने से पहले इम्तियाज़ के सर से पसीना टपक रहा था. जाने कितनी बार उन्होंने थूक घोटा था. उनकी दिल की धडकने मेरे कान में बज रही थी. उनकी खून का दबाव मैं महसूस कर रही थी. उस कॉलेज की भीड़ में इम्तियाज़ एक अनजान चहरे थे. शर्ट और पेंट पहनने वाले, हिंदी कविताएं लिखने वाले. जहाँ सब अंग्रेजी में कविताये सुना कर गए, वहां क्या उनकी कविताओं को जगह मिलती, वे बस यही सोच रहे थे.

“मुझे एक कमरा दे दो बस,

छत्त पर कहीं..

कोने में ही सही..

बैठ कर अकेले वहां ..

ख्वाब अपने बुनता रहू

सोचता रहूँ की उन ख्वाबो को कैसे सच करूँ मैं..

उनको तोलता रहूँ जीवन की सचाई से..

फिर फिर निष्कर्ष पर आकर उन्हें तोड़ने की जिद ठान लू मैं..”

इम्तियाज़ ने जब ये कविता खत्म की तो मैंने अपने आप को जोर से नोचा था. ये वो घबराया हुआ आदमी नहीं हो सकता, जिसे ऐसे देख कर लग रहा था की रो पड़ेगा. मैं मम्मी को कैसे बताती की वक्त नहीं था ये सोचने का की इस आदमी से मोहब्बत करू की नहीं.

इम्तियाज़ के कविता पे ढेरों तालियाँ नहीं बजी. क्यूंकि कोई भी उनकी कविता से जुड़ नहीं पाया था. मेरे सिवा. जहाँ सब एक तरफ लोग सामाजिक त्रुटियों और देश पे कविता बोल रहे थे, इम्तियाज़ ने अपने आप को कविता का विषय बना लिया.

अगले दिन जब लाइब्रेरी में उनसे मिली थी तब भी यही सवाल किया था. उनसे पहली बातचीत ही सवाल से शुरू हुई थी. बैठ कर आराम से ‘धूमिल’ को पढ़ रहे थे.

“आपकी कविता कल सुनी थी.”

वह एकदम से हकबका गए.

“मुझे पसंद आई थी.”

अब मुस्कुराये.

“थैंक्स.”

“एक सवाल है मगर.”

“क्या?”

“ये कविता थी किसके ऊपर? मतलब कौन कमरे में अकेले पड़ा रहना चाहता है?”

“ये तो मुझे भी नहीं पता.”
“तो फिर आपने लिखी कैसे? ख्याल कहाँ से आया?”

“बस लिख दी. कविताएं और कहानियाँ अन्दर ही किसी कोने से निकलती है. मगर शुक्रिया. कम से कम आपको पसंद आई.”

उस दिन के बाद से इम्तियाज़ और मैं रोजाना लाइब्रेरी में मिलते थे. वे अपनी दूसरी कवितायेँ भी सुनाते. ये अजीब था कुछ. उनको सुनना. ऐसे लाइब्रेरी में धीमी आवाज़ में उनका अपनी कविताओं को पढना. मेरा मंद-मंद मुस्काना. ये सब बहुत अजीब था. पापा ने कहा था की अपना नाम याद कर लेती एक बार ये गुनाह करने से पहले. ‘जूही पाठक’. इसमें याद करने जैसा क्या था? उन्हें कैसे बताती की जब इम्तियाज़ को सुनती थी तो अपने बारे में भूल जाती थी, नाम का क्या करती मैं.

वो किताब आज भी संभाल के मैंने अलमारी में रखी है. इम्तियाज़ ने मेरे जन्मदिन पर दी थी. प्रेमचंद की गबन के पीछे वाले पन्ने पे अपनी एक छोटी सी कविता लिख के.

“मैं लिख नहीं पा रहा हूँ, जब से तुम्हे पढ़ा है.

शौख अब कलम का ख़त्म हो गया है..

और जज़्बात अब सारे बस मोहब्बत करते है.

दिल का तेज़ी से धड़कने का वक्त हो गया है.

चलो, इसकी तड़प का हम भी ख्याल रखते है.

मैं चुपचाप सा रहता हूँ, जब से तुम्हे सुना है,

कमजोर इस दिल का हाल हो गया है.

अलफ़ाज़ अब जुबां का साथ नहीं देते..

चलो, अब इशारो में ही अहसास व्यक्त करतें है.”

 

ये उनकी सबसे साधारण कविता थी. मैंने उनसे कहा भी था. थोडा नाराज़ थे सुनकर. और मैं खूब हसी थी उनकी नाराज़गी देख कर. उनको प्यार करने के बावजूद भी उनकी समीक्षा कर देती थी. और ये कविता तो उनके दिल के बहुत करीब थी. क्यूंकि ये मेरे लिए थी. मैंने इम्तियाज़ से कहा था कि तुम कभी दूसरो के लिए नहीं लिख पाएंगे. मुझ पर भी नहीं.

“जब मैं अपने बारे में लिखता हूँ, सबके बारे में ही होता है वो. हम अन्दर से एक जैसे ही है, जूही.”

“फिर मेरे लिए ये वाली कविता क्यूँ लिखी?”
“तुम्हे इम्प्रेस करना था. बनावटी हो गया मैं भी.”

“तुम ऐसे ही रहना, जैसे हो. तुम्हे ऐसे देखना, तुम्हारी कविता सुनने से कम नहीं.”

“एक बात बताओ?”

“क्या?”

“कुछ नहीं.”

वे चुप हो कर रह गए थे.

जब एक साल बाद उनकी नौकरी एक हिंदी अखबार में लग गई थी लखनऊ में, उस दिन मैंने घर पे सबको इम्तियाज़ के बारे में बताया था. पापा ने पहली बार मुझ पे हाथ छोड़ा था. वो सिर्फ मेरे दिल का टूटना नहीं था. दो साल समाजशास्त्र पढने के बावजूद, वो चाटा मेरा पहला कदम था समाज को समझने की दिशा में. मैं इम्तियाज़ से प्यार नहीं कर सकती थी. मुझे इम्तियाज़ का ‘कुछ नहीं’ उसी वक्त याद आया. वो उस दिन शायद यही पूछना चाहते थे कि हम दोनों का कोई भविष्य है या नहीं.

 

मैंने फ़ोन पे इम्तियाज़ को बताया था जो भी हुआ था घर पे. वे ज्यादा कुछ बोले नहीं. ये कहकर की बनारस आ कर बात करता हूँ, उन्होंने फ़ोन काट दिया था.

 

उसी रात मम्मी मेरे कमरे में आई थी. ये पूछने की कि मैंने कहीं कोई कोई गलती तो नहीं की. मैंने अपना सर झुका लिया था.

“तूने एक बार भी सोचा नहीं ये सब करने से पहले.”

“आप जैसा सोच रही है, वैसा कुछ नहीं हुआ है. मुझे बस दुःख है कि आप ऐसा सोच रही है.”

मेरी कोई सुनने वाला नहीं था. इम्तियाज़ मेरे लिए अब ज्यादा मुसलमान हो रहे थे. कभी पापा बताते. कभी मम्मी. कभी भाई और कभी बहने. इम्तियाज़ मुझे बताते थे की उनके घर पर भी मेरे हिन्दू होने की बात चलती थी बस. मैं यही सोचती थी की मैंने और इम्तियाज़ ने इतना क्यों नहीं सोचा. या फिर सोच ही नहीं पाए.

चौबीस साल की उम्र में इंसान कैसे – कैसे फैसले लेता है. मैंने घर पर एक चिट्ठी छोड़ी की मुझे अकेला छोड़ दिया जाए. उस रात निकल गयी लखनऊ के लिए. इम्तियाज़ बनारस स्टेशन पर आने वाले थे लेने और फिर अगली गाडी से हम दोनों निकल जाते लखनऊ. प्लेटफार्म पर दो घंटे तक उनका इंतज़ार करती रही. सोचा था सबसे पहले कहूँगी एक कविता सुनाने को. पुल पर देखती तो वे नहीं दीखते. बस लगातार देखती रहती. अब आयेंगे. अब आ ही जाएंगे. मगर इम्तियाज़ नहीं आये.

 

कुछ देर बाद मैं घर लौट गयी. वो चिट्ठी सब ने पढ़ ली थी. पापा ने इस बार चार थप्पड़ और मारें थे. खून भी निकला था. पूरी कालोनी में मज़ाक बना था. पापा उसकी को लेकर परेशान थे. मम्मी भी. भाई भी और पूरा परिवार.

उस वक्त मुझे इम्तियाज़ दिख रहे थे. उसी स्टेज के बगल में जहाँ मैंने उन्हें पहली बार देखा था. घबराए हुए. अपनी सबसे पसंदीदा कविता पढने से पहले की घबराहट.

“मुझे इलज़ाम लेना पसंद नहीं मगर हाँ मैंने अभी-अभी तुम्हे धोखा दिया है,

और याद रखना की इस धोखे का कारण मेरा मुसलमान होना है भी और नहीं भी.”

उनकी ये आखरी चिट्ठी भी मेरे अलमारी में पड़ी है. मुझे इस बात का दर्द है की उस रात इम्तियाज़ स्टेशन नहीं आये. इस बात की ख़ुशी भी कि वो नहीं आये. मेरे समाज को यही लगता रहा की उन्होंने मुझे धोखा दिया क्यूंकि वो मुस्लमान थे. उन्हें ये कभी अहसास नहीं होगा की हमे हिन्दू और मुस्लमान बनाकर उन्होंने हमारे साथ कितना बड़ा धोखा किया था.

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About ishubhampandey

A sincere child of an insincere world.
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2 Responses to इम्तियाज़ नहीं आये

  1. Priyesh Mishra says:

    bhaut khub……

  2. Akhilesh says:

    Great

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