क्या ये गमले भी साथ जायेंगे?

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मैंने माँ से पुछा था कि हम नानी के घर जा रहे थे क्या? उन्होंने सर हिला के मना कर दिया. पापा से भी यही सवाल किया था. उनका भी वही जवाब मिला था. नानी के घर जब भी जाते थे तो ऐसे ही सामान लगाती थी माँ. लेकिन इस बार तो वो बिस्तर भी ले जा रही थी. लालटेन भी जा रहा था हमारे साथ. छत पे गयी तो वहा से गमले भी हटा दिए थे माँ ने. मैंने फिर पुछा की क्या गमले भी हमारे साथ ही जाएंगे? उन्होने फिर कोई जवाब नहीं दिया. ये सब कुछ मेरे लिए अजीब था. ढेरो सवाल मन में रखें रहना और उनका जवाब न खोज पाना.

पिछले एक महीने से ही माँ दुखी लग रही थी. पापा मगर ठीक थे. मगर आज वे भी उदास थे. कुछ देर बाद मैंने देखा की हमारा सारा सामान एक गाडी में लद के कहीं जाने लगा था. मैंने पापा से फिर पुछा ये कहाँ जा रहा है सब?

उन्होंने मुझे गोद में उठया और कहा, “हमारे नए घर.”

मेरे लिए बहुत ख़ुशी की बात थी. मगर बचपन से लेकर अब तक मुझे यही लगता था की ये गाँव ही हमारा घर है. चूरना गाँव. जहां मैं पैदा हुई. पापा ने बताया की जहां जा रहे है उस गाँव का नाम भी यही है. बस आगे नया लग गया है. नया चूरना. ये बात मेरे लिए बहुत रोचक थी. किसी गाँव का एकदम से नया हो जाना. नयी चीज़े किसी भी बच्चे के लिए उत्साह से भर पूर होती थी. नया खिलौना, नया दोस्त और अब एक नया गाँव. मुझे पहले-पहले लगा की मैं गाँव के बगीचे को बहुत याद करुँगी. और अपना स्कूल भी. और जो पास में झरना था वो भी. मगर ये ‘नया’ गाँव मेरे लिए सब कुछ था अब.

पापा नए गाँव में एक दूकान लगाने वाले थे. उन्हें सरकार ने पैसे भी दिए थे. ज़मीन भी दी थी नए गाँव में. मेरे लिए सरकार किसी भगवान से कम नहीं थी उस वक्त. सरकार क्या होती है ये नहीं पता था. बस सुनती थी की सरकार ने नए गाँव में बिजली भी दी है. घर भी दिए है. खेती करने लिए खेत भी दिए है. जब थोड़ा वक्त गुज़रा तो पता लगा दरअसल सरकार क्या होती है. थोड़ा और वक्त गुज़रा तो मालूम पड़ गया सरकार असल में क्या होती है.

जब दस दिन बाद हम नए गाँव पहुचे तो फिर कई सवाल मेरे दस साल के दिमाग में दौड़ने लगे थे. पचमढ़ी के जंगलो से उठकर हम सतपुड़ा के सूखे जंगलो से होते हुए एक अलग ही जगह में आ चुके थे. पापा ने हमारा घर दिखाया जिसके अभी सिर्फ दो कमरे बने थे. हमारे घर के बगल में एक और घर था, एकदम सटा हुआ. उसके भी दो ही कमरे बने थे. और वो भी एकदम हमारे ही कमरों जैसा बना हुआ था. ये कैसा गाँव था, मैंने अपने आप से पुछा और फिर पापा से. उन्होंने जवाब टाल दिया. मुझे पीछे मुड़ने को कहा. मैं पीछे मुड़ी तो देखा की एक सफ़ेद बिल्डिंग थी. उसपे लिखा हुआ था ‘नया चूरना विद्यालय’. पापा ने कहा यही तुम्हारा स्कूल होगा. मगर पिछले गाँव में तो ५ किलोमीटर दूर था स्कूल. मैं, नन्ही, छोटी, सब साइकिल चला के जाते थे.

दस दिन बाद हमारे घर तैयार हो गए. सब के सब एक जैसे. एक बार एक किताब में ऐसे घर देखे थे. शहर के घर ऐसे होते थे. एक जैसे. सब के सब. मुझे गुस्सा आया था. मेरा घर अब नन्ही के घर जैसा ही था. हमारे पुराने घर में एक गलियारा सा बना होता था. इस घर में नहीं था. मैं नन्ही को हमेशा चिढ़ाती थी कि उसके घर में कोई गलियारा नहीं था मगर मेरे यहाँ था. अब नहीं चिढ़ा पाऊँगी.

स्कूल भी घर से महज दस कदम पर ही था. ऐसा भी कोई स्कूल होता है क्या. मैंने पढने से मन किया था. जिद थी की अपने पुराने वाले स्कूल में जा कर पढूंगी. पापा ने डाट दिया था. बोले थे वो स्कूल अब ३०० किलोमीटर पीछे छूट चूका है. इतनी गणित आ गयी थी उस वक्त तक की पता चला गया की ३०० किलोमीटर कितने होते है. मगर सही मायनो में दूरी का अहसास अब घर करना शुरू किया था.

घर बनने के एक महीने बाद एक आदमी आया और पापा को एक कागज़ थमा के चला गया. “ये एक और मुसीबत आन पड़ी’. ये वाक्य उनके मुंह से पिछले एक महीने में अनगिनत बार सुन चुकी थी. जब सरकार से मिले खेत बंजर निकले थे तब भी और जब सरकार से मिले दस लाख रूपए घर बनाने में ही खर्च हो गए थे तब भी. खिड़कियाँ और दरवाज़े अब भी नहीं लगे थे घर में. मुसीबतों को तो दरवाज़े पर दस्तक देने की ज़रूरत भी नहीं थी. सीधा घुस सकती थी. और घुस भी रही थी.

ये जो कागज़ पापा के हाथ में था, वो बिजली का बिल था, हलाकि पिछले एक महीने में बिजली एक बार भी आई नहीं थी. अगले चार महीने भी नहीं आई. बिल मगर आते रहे. ज़मीने बंजर थी. घर पक्के होकर भी घर नहीं थे. छत थी मगर सीढ़ी नहीं बनी थी. दुआर था मगर वहाँ खाट बिछा के सो नहीं सकते थे.

‘ये कैसा नया गाँव है, पापा.” मैंने फिर पुछा था.

“बिजली आ जाएगी अगले छह महीनो में. थोड़ा टाइम लगेगा. सरकारी काम है. वक्त लग जाता है.”

ये शब्द शहर से आये कलेक्टर के थे. उसने ऐसे बात की जैसे सब अच्छा था. पापा उस दिन खुश थे. आखिरकार कोई तो सरकार की तरफ से आया और दिलासा दिया की सब कुछ ठीक हो जाएगा. मगर छह महीने और गुज़रे, बिजली फिर भी नहीं आई. ज़मीने अब भी बंजर थी और कहीं दुसरी जगह ज़मीन देने का वादा भी अब बंजर ही लग रहा था.

मुझे मेरे पुराने गांव के बगीचे के बहुत याद आती थी. कुँए के पानी की भी. वहाँ मौसम भी कितना अच्छा था. झरना भी था. यहाँ तो बस गर्मी थी. सूखा जंगल चारो तरफ. उस दिन मालूम चला की अपने बगींचे की छांव दुसरे के बगीचे की छाँव से अलग होती है.

सरकार को ये बात कैसे नहीं पता थी. वो कैसे हमारे घरो को हमसे छीन कर हमे पक्के मकानों में जगह दे सकते थे? वो कैसे हमारी ज़मीनों का दाम लगाकर फैक्टरियों को बनने दे सकते थे? जब मैं १६ साल की हुई तो शहर जाने पर पता चला की मेरा प्रदेश विकास कर चूका था पिछले दस सालों में. हमारी सरकार ने बहुत अच्छा काम किया था. उस बिना दरवाज़े वाले घर में जो घना अँधेरा होता था वो इस विकास उत्सव के एकदम परे था. हमारे गाँव से शहर के लिए जो एक कच्चा रास्ता बनाया था सरकार ने वो भी इसी विकास की देन थी. वो रास्ता आज भी हमे ये चीख – चीख के कहता है कि यहाँ गाँव में तुम्हारा गुज़र नहीं हो सकता. जाओ. शहर जाओं. वही सब कुछ है. सरकार ने ये सड़क बना तो दी है मगर वो इसे पकड़ कर तुम तक कभी पहुचेगी नहीं. तुम्हे इसे पकड़ कर उस तक पहुचना है. वहाँ जहां वो अपने विकास का उत्सव मना रही है.

 

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