क्या वो तितली युद्ध के बाद भी उतनी ही खूबसूरत रहेगी?

युद्ध एक बहुत ही रहस्यमयी चीज़ है. सबको करना नहीं आता मगर सबकी डिमांड होती है की युद्ध हो. एक ऐसा ही शब्द है वर्ल्ड वार. मुझे स्कूल में इतिहास पढ़ते वक्त बहुत रोचक लगता था. पहले वर्ल्ड वार में इतनी मौतें हुई और दुसरे में इतनी. किताब में हम पढ़ते थे. उस वक्त बस वर्ल्ड वार को जीना था हमें.

कुछ ऐसे युद्ध की पब्लिसिटी की गयी थी किताबों में की युद्ध को जीने का मन करता था. कारगिल जब हुआ तब बहुत छोटा था. ये याद है की जब मालूम पड़ा था की भारत कारगिल का युद्ध जीत गया है तो बहुत ख़ुशी हुई थी. पाकिस्तान को धुल चटा दी थी भारत ने, ऐसा अखबारों ने कहा था.

युद्ध मगर लाखों लोगो की जान ले लेते है और जाने कितनो को अपनी और आकर्षित कर लेते है. हमने तुम्हे तब भी हराया था, उस वक्त भी और हाँ, तीस साल पहले भी. ये जान लेने पर की हम कभी युद्ध हारते नहीं, एक ऐसा अहसास होता है की हमने कुछ पा लिया है.

लेकिन युद्ध हमसे बहुत कुछ छीन भी लेते है. शायद सोच पाने की शक्ति. ये सवाल करने की शक्ति की आखिर युद्ध होते ही क्यूँ है? कौन है जो इनके होने की बात करता है?

हाल ही में, पाकिस्तान के एक आतंकवादी संगठन ने १८ भारतीय सनिकों की जान ले ली. इसका जवाब देने की तयारी चल रही है. लगभग हर एक भारतीय युद्ध चाहता है पाकिस्तान से. रोज़ ऑफिस जाने वाला हर आदमी, जिसे नहीं पता की जब सीमा पर गोली बारी होती है तब तीन दिन तक कान सुन्न रहते है. वो आदमी चाहता है की वही सैनिक जिसके मर जाने पर वो आंसू बहायेगा और जिसकी शहादत को याद करने के बारे में बात करेगा मगर याद करेगा नहीं, उसके लिए या फिर यूँ कहे की उसके ईगो के लिए पाकिस्तान से युद्ध करे.

आतंकवादी हमले को हम नकार नहीं सकते. सैनिक मारे गए. इसको भी नहीं. ये चलन तो शायद पिछले ६९ साल से चला ही आ रहा है. हमें ये नहीं लगता की ये अचानक से आतंकवादी संगठनो का उभर के आना, दोनों तरफ. बम फोड़ना, लोगो को मारना इतना आसन कैसे हो गया. इन आतंकवादी संगठनो की नीव आखिर रखी किसने? पाकिस्तान ने? भारत ने? अमेरिका ने? रूस ने? चीन ने?

या फिर हमारे युद्ध करने की जिद्द ने?

वह आतकंवादी जो हमारे १८ जवानो को मार गए. उनके लिए भी तो एक युद्ध ही चल रहा है न. उनके लिए कहीं हम उन जैसे ही तो नहीं. सबके अपने-अपने सच हो सकते है न? फिर ये नहीं लगता की ‘पाकिस्तान को ख़त्म कर देना चाहिए’ और ‘वक्त आ गया है परमाणु बम निकालने का’ जैसी बातें भी वैसी है जैसी की उन आतंकवादियों के कैंप में की जाती होंगी. युद्ध को आप जस्टीफ़ाइड नहीं कर सकते न. की मैं तुम्हे मार दूं क्यूंकि तुमने हमारे लोग मारे थे. तुम मुझे मारोगे तो वो गलत होगा.

किसी को मारने की बात, युद्ध की चेतवानी देती है. बदले के  लिए मारना हो या अपने आप को दुसरे से ज्यादा काबिल साबित करने के लिए. मैं कभी-कभी सोचता हूँ की पहली बार युद्ध क्यूँ हुआ होगा? किसकी गलती रही होगी? किसने कहा होगा पहली बार की उन लोगो को गोली से उड़ा दो.

वो जो भी होगा. क्या उसने अपने देश के भले के लिए ये कहा होगा? अपने रिलिजन के भले के लिए? या बस अपने ईगो के भले के लिए?

भारतीय होने के नाते, मेरी रूचि इस वक्त ये जानने में है की कितने लोग हमने युद्ध के चलते खो दिए है. इनमे सिफ हमारे जवान नहीं है. बल्कि वे भी लोग है जिनको मरने के लिए पे नहीं किया गया. पाकिस्तान को जवाब देने के प्रोसेस में कितनी जानें ले ली गयी, बस ये जानना है. १९६५ के बाद, ७१ के बाद, ९९ के जीत के बाद हमने कितना विकास किया और इन लडाइयों के बाद हमारा दुश्मन कितना सीख गया ये भी जानना चाहता हूँ. दरअसल, ६९ सरकार ने सीमा के दोनों तरफ और कुछ नहीं दिया, बस युद्ध दियें है. हमें उन्हें अच्छा मानाने की सीख दी है. हमें ये सोच दी है की आगे भी युद्ध होता रहे.

अगर युद्ध का होना, कल को पाकिस्तान से भारत के सम्बन्ध अच्छे भी कर देता है, तब भी मैं युद्ध नहीं करूँगा. मैं शायद किसी और देश चला जाऊंगा. शायद वेनिस चला जाऊंगा. वहां लोग शादी के बाद हनीमून पे जाते है. मई अभी चला जाऊंगा.जब यहाँ लोग एक दुसरे को ख़त्म कर चुके होंगे, सब कुछ बर्बाद हो चूका होगा, तब मैं फिर वापस आऊंगा. इसलिए नहीं की भारत मुझे खीच लाएगा. मैं तो उस एक तितली को धुंडने आऊंगा जो उस युद्ध के खत्म होने के बावजूद भी उतनी ही खूबसूरत होगी जैसे पहले थी.

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