बेस्वाद खाना और ज़िन्दगी

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लंचबॉक्स फिल्म के साजन फेर्नान्देस को याद कर के अजीब लगता है. कल रात को घर लौटते वक्त वैसा ही महसूस हो रहा था. रात को रोटी और दाल खा के सो जाना. वो भी अपने हाथ से बनाया हुआ नहीं. सुबह काम पे निकल जाना. अकेले. दिन भर काम करना. लंच के होने का इंतज़ार करना और फिर खाना देख के बिदक जाना. घर लौटना. फिर अकेले. बालकनी में खड़े हो सिगरेट फूकना. ऐसा सब कुछ अपनी ज़िन्दगी में नहीं मगर कुछ तो साजन जैसा ही है.

अकेलेपन से इतना प्यार हो जाना कि न ही वो अच्छा लगे, ना ही वो बुरा लगे. ज़िन्दगी का लंचबॉक्स हो जाना बड़ा तकलीफदेह है. जिसमे रोज़ एक जैसा. एक ही स्वाद वाला खाना आता है. और रोज़ वो ही खाना है. किसी और स्वाद की कोई गुंजाईश नहीं.

फिर एक दिन लंचबॉक्स में खाने का रंग कुछ अलग सा भी दिखता है. खाने में स्वाद है. ये कैसे हो गया. इस बदलाव के बारे में कभी सोचा नहीं था. ज़िन्दगी ऐसी भी होती है. चटपटी. लेकिन ये स्वाद आपके लिए था ही नहीं कभी, ये जान के थोडा दुःख भी होता होगा. स्वाद अपना पता भूल गया था. साजन को अकेले ही रहना था. उसने वही चुना. उसे चिढ़ थी उस खाने से मगर खाना भी वही चाहता था.

बेस्वाद खाने का भी एक स्वाद होता है. उसको खाने का तरीका भी एक ही होता है. दो साल तक मैंने बेस्वाद खाना खाया है. इस तरीके को खाना निगल जाना कहते है. रोटी को जीभ पर टिकने न देने की कला. जब इस कला में महान बन जाते है. फिर दिक्कत तब होती है जब स्वादिष्ट खाना कभी बीच-बीच में मिल जाता है. उसे भी आप निगल जातें है. जीभ पर टिकने नहीं देते.

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साजन के साथ भी ऐसा ही हुआ. उसे ज़िन्दगी में स्वाद तो मालूम चला मगर उसे ये भी मालूम था कि ये ज्यादा देर तक जुबां में टिकाये रखना ठीक नहीं. उसे आदत लग गयी तो इसके अकाल में जी नहीं पायेगा. इसीलिए अकेलापन अच्छा होता है. उसपे किसी स्वाद या किसी के होने का बोझ नहीं होता.उसकी आदत ज़िन्दगी भर कायम रह सकती है. उसके साथ आप जी सकते है. अकेले.

वो भूटान भी नहीं गया. उसने मना कर दिया. ये स्वीकार कर लिया कि यहाँ जो अकेलापन है वहां के हैप्पीनेस इंडेक्स से ज्यादा अच्छा है. रोज़ स्वादिष्ट खाना अच्छा नहीं है उसके लिए क्यूंकि एक वक्त के बाद सब कुछ बदल जाता है. सब कुछ. और उस बेस्वाद ज़िन्दगी से अच्छी है, ये बेस्वाद ज़िन्दगी. जहाँ स्वादिष्ट खाने का इंतज़ार नहीं. कोई आशा नहीं. ये निराश होने से कहीं अच्छी स्थिति है

 

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A sincere child of an insincere world.
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