कहानी: काशी पाण्डेय

अजीब सा घर था वो. ये बात उस वक्त समझ नही आई थी जब तक उस घर का दरवाज़ा नहीं खुला था. दरवाजा जब खुला तब देखा कि वो घर बाहर से जितना खुशमिजाज़ लग रहा था, अन्दर से उतना ही डरावना था.

मैं एक ऐसे आदमी का इंटरव्यू करने आया था जो 7 साल तक जेल में सजा काट चूका था. चार लोगो के हत्या करने के जुर्म में काशी पाण्डेय 7 साल तक जेल में बंद थे. क्राइम रिपोर्टिंग की दुनिया में मेरा बस ये पहला ही महिना था. जब पत्रकारिता की पढाई शुरू की थी तो वो इसलिए की मुझे क्राइम रिपोर्टर बनना था. दो दिन पहले जब एडिटर ने कुछ नया लाने को कहा तब दिमाग ने काम करना बंद कर दिया.

“वो युवा आग कहाँ हैं तुममे?”

ये सुन के मेरे अन्दर का पत्रकार जाग गया था. मैंने दो महीने पहले जेल से छुटे काशी पाण्डेय का इंटरव्यू लेने की सोच ली. ये वो आदमी था जिसने सन २००० में हुए शहर के एक छोटे से दंगे में चार लोगो की जान ली थी. शुरू में ये बात पची नहीं थी मुझे. दंगो में तो कितने ही लोग काट दिए जाते है. फिर सिर्फ इसे ही क्यूँ सजा मिली और बस ४ लोग ही मारने के जुर्म में? बाकी आरोपी कहाँ गए? उनका कोई नामोनिशान नहीं था. कहीं भी.

इन सवालों ने मुझे काशी पाण्डेय के घर के चौखट पे खड़ा कर दिया था.

जब दरवाज़ा खुला था तो काशी सामने थे. मेरी दिल की धड़कने तेज़ थी. इतने सालो से आतंकवादियों, दंगाइयो की कहानियाँ सुनते आ रहा था. और अब मेरे सामने खुद एक ऐसा आदमी खड़ा था जिसने कभी किसी दंगे को भड़काया था और लोगो की जान ली थी. मैं ये सोच के डर रहा था की ये आदमी मेरे साथ क्या करेगा?

फिर उसकी आवाज़ आई…

“अन्दर आ जाओ? अरे ज़रा रुको….तुम्ही हो समीर?

“जी.”

“अपना कार्ड दिखाओ?”

“जी..ये रहा.”

“हाँ…अब अन्दर आ जाओ.”

काशी तौलिये में थे. ऐसा लग रहा था अभी-अभी नहा के निकले है. उन्होंने मुझसे ज़रा सा वक्त माँगा और कपड़े पहनने चले गए.

मैं उस दौरान कमरे में रखे चीजों को देखने लगा. कुछ तसवीरें थी. उसमें एक औरत और एक लड़का था. काशी का परिवार होगा शायद, ये सोचकर मैंने मुंह टेबल पर रखी किताबो की ओर मोड़ लिया. सारी किताबे हिंदी में ही थी. कुछ उर्दू की भी थी.

“उनमे से कुछ पढना हो तो पढ़ सकते हो..मैं ज़रा बाहर से आता हूँ. दूध नहीं है.” पीछे से आवाज़ आई.

“अरे नहीं..इसकी कोई ज़रूरत नहीं.”

“ज़रूरत क्यूँ नहीं है…मैं नहाने के बाद ही चाय पीता हूँ. अच्छा सुनो? तुम भी चाय पिओगे?”

मैं हक्काबक्का रह गया.

“जी नहीं.”

ये सुनकर काशी बाहर दूध लाने चले गए.

वापस लौटे, चाय बनाई और फिर मेरे साथ सोफे पर आ कर बैठ गये.

“हाँ तो बताओ. क्या बात है?”

“कुछ नहीं. बस बातें करनी थी आपसे.”

“तो करो..”

“जी. आपको जेल से छूटे तक़रीबन दो महीने हो गए है. क्या किया आपने इन दो महीनो में?”

“यही जो अभी कर रहा हूँ. सुबह उठता हूँ, नहाता हूँ. चाय पीता हूँ. एक छोटी सी नौकरी है…गार्ड की ..वो करने जाता हूँ. वापस आता हूँ. खाना बनाता हूँ, खाता हूँ. और सो जाता हूँ.”

“मेरे पूछने का मतलब ये था की ये जो नयी ज़िन्दगी मिली है आपको….?”

“तुमने कहा था तुम मुझसे बातें करने आये हो. मगर तुम तो सवाल कर रहे हो. बातें करो न.”

“सवालों से ही तो बातें निकलेंगी. वरना हम क्या बातें करेंगे?”

“तो कम से कम जानने की कोशिश तो करो मुझे. कौन हूँ मैं? क्या हूँ? क्या अच्छा लगता है. ये सब.”

काशी मेरे लिए धीरे धीरे बदल रहे थे. जिस छवि को लेकर मैं आया था. उन्होंने उस छवि को एक झटके में तोड़ दिया था. मगर मेरे लिए अब भी वो एक जेल से छूटा आदमी ही थे.

“जितना जानता हूँ, उसी के कारण मैं आपसे मिलने आया हूँ.”

“क्या जानते हो?”

“वही जो सबको पता है. जो अखबारों में छपा है.”

“अखबारों में सब सच छपता है क्या? अपने आप को बचा नहीं रहा..बस पूछ रहा हूँ.”

“हाँ. वही छपता है जो सच होता है. या सच के करीब.”

“सच के करीब क्या होता है?”

“आप तो मेरा इंटरव्यू लेने लगे.”

“तुम्हे पता भी नहीं चला की हम दोनों कितने गंभीर विषय पर बात करने लगे. एक दुसरे के बारे में न जानते हुए भी. तुम्हे बस सवालों की पड़ी है.”

“क्या आपने सचमुच लोगो की जान ली है?”

काशी खामोश हो गए. अब तक की हुयी बातचीत में वो काफी खुशनुमा लगे थे. इस एक सवाल ने जैसे उनको तोड़ दिया.

“हाँ.”

ये सवाल सुन के मेरे अन्दर एक जान आई. एक पत्रकार के लिए किसी से जवाब निकलवा लेना एक बहुत ही ख़ुशी की बात होती है. खासकर वो बात जो अगले दिन हैडलाइन में जमेगी. काशी की बातें कही न कहीं मुझे बहुत चिड़ा रही थी. मेरे अन्दर उन्हें लेके एक गुस्सा ज़रूर था कि कैसे ये आदमी इतना हल्का महसूस कर सकता है. उनका हाँ बोलना मेरे लिए किसी जीत से कम नहीं था.

“क्या वजह थी कि आपने हिंसा को अपना रास्ता बनाया?”

काशी गौर से मेरी ओर देखे और फिर उठके खिड़की के पास चले गए. जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला. माचिस से सिगरेट जलाई और धुंआ पीने लगे. मुझे लगा की मैं बहुत जल्दी जा रहा हूँ. मैं ठहर गया.

“आप इस सवाल का जवाब नहीं भी देना चाहे तो ठीक है.”

“नहीं. मैं ये सोच रहा हूँ की तुमको क्या जवाब दू,” काशी ने सिगरेट पीते और खिडकी से बाहर झाकते हुए कहा.

“जो भी आप देना चाहे. जो भी सच है.”

“सच के थोडा करीब भी हो तो चलेगा?”ये बोलते हुए उन्होंने मेरी ओेर देखा.

“सच हो तो ज्यादा अच्छा है. सच के करीब कई झूठ भी होते है.”

“तुम्हे कैसे पता चलेगा की सच क्या है? मैं तुमको दस ऐसे किस्से बता सकता हूँ जो सच ही लगेंगे. कैसे मानोगे की यही सच है? ऐसा क्या होता है पत्रकारों में की वो मान जाते है ये ही सच है?”

“जो आप बोल दे, हम वो छाप देंगे. ये सोच के की सच के करीब बस इतना ही था.”

“तो इसका मतलब की असली सच क्या है..ये सिर्फ उसे ही पता होता है जिसके पास वो सच है.”

“ह्म्म्म.”

“तब तो ये अख़बार बंद हो जाने चाहिए.”

“ये लोगो पे छोड़ दीजिये. हमारा काम है लोगो को सच के करीब ले जा के छोड़ देना और फिर उनपर छोड़ देना ये तय करने के लिए कि क्या सही है और क्या गलत?”

“मतलब की सबकुछ दृष्टिकोण है..सच कुछ भी नहीं.”

“ये सब खेल मत खेलिए. मैं आपके यहाँ ये सब बातें करने के लिए नहीं आया. आपका इंटरव्यू करने आया हूँ.”

“तुमने शुरू में बोला मुझसे बातें करने आये हो. खैर…ये जो इतनी बातें हमने की …तुम इनके बुनियाद पे मेरे बारे में जो छापना चाहों छाप सकते हो. मैं कुछ नहीं कहूँगा.”

“ये क्या बात हुई? ऐसा नहीं होता है.”

“मैं देखना चाहता हूँ की तुम मेरे सच के कितने करीब थे.”

“अगर आपको बात नहीं करनी है तो बता दीजिये. मैं चला जाता हूँ. मगर मैं ऐसी बचकानी बातें सुनने नहीं आया.”

मैं ये बोल कर उठने लगा.

“बैठ जाओ. और पूछो जो पूछना है.”

काशी फिर मेरे बगल में आकर बैठ गए.

“दंगा भड़काने में किन-किन लोगो का हाथ था?”

“सबका.”

“सबका किसका?”

“सबका. हम सब का.”

“फिर से वही शब्दों का जाल बना रहे है आप.”

“मैं इसे तारीफ़ समझूंगा. मगर मैं सच बोल रहा हूँ.”

“ये सच नहीं है. लोग मारे गए थे. तक़रीबन ५० लोग. ४ आपने भी मारे थे. इसीलिए आप जेल में बंद थे इतने साल.”

“वो दंगा नहीं था.”

“तो फिर क्या था?”

“वो बेवकूफी थी.”

“मैं समझा नहीं.”

“कैसे समझाऊ? छोड़ो रहने दो.”

“समझाइये. मैं समझने के लिए ही यहाँ आया हूँ.”

“ऐसा कोई सच नहीं है, समीर. दंगे हर आदमी के लिए एक अलग सच होते है. दरअसल इस शहर में दंगा हुआ ही नहीं था. लड़ाई हुई थी यहीं बगल वाली गली में. कोई मारा नहीं था मगर उस दिन. अगले दिन दस लोगो की लाश इसी गली में पायी गयी थी. उनमे से दो लोग वो थे जो उस दिन लड़ रहे थे. बाकी ८ कौन थे किसी को नहीं पता. हम सब डर गए थे. उस डर को लोगो ने दंगा बोल दिया.”

“और ५० लोगों के मारें जाने की खबर का क्या?”

“वो दूसरी रात को मरें. सब डर गए थे. हर तरफ अफरा तफरी थी. मैं यकीं नहीं कर पा रहा था कि इस मोहल्ले के लोग एक दूसरेको मार कैसे सकते है. बाद में पता लगा कि कोई बाहरी ताकत थी जो इस डर को हवा दे रही थी.”

“आपने भी जाने ली.”

काशी फिर चुप हो गए. फिर से सिगरेट निकाले और खिड़की पर जा कर खडे हो गए.

“मैं दो बच्चियों और एक बेटे का बाप था. अपनी पत्नी से बहुत मोहब्बत करता था. कॉलेज में मिले थे हम दोनों. तुमने कभी किसी से प्यार किया है?”

मेरे लिए बहुत ही अटपटा सवाल था ये. मैं जवाब देने के स्थिति में नहीं था.

“प्यार बहुत ही अजीब चीज़ होती है. सबसे खतरनाक भी.”

“आपका परिवार कहाँ है फिर?”

“उन्ही दंगो ने मार डाला.”

पूरे कमरे में शान्ति फैल गयी. मैं कुछ बोलने के हालत में नहीं था मगर ये जान गया कि वो क्या हालात थे जिन्होंने काशी को खुनी बना दिया.

“मैं समझ सकता हूँ. आपने अपना परिवार खोया दंगो में. मगर क्या ये सही है की आप भी वही राह चुने जो उन लोगो ने चुना जिन्होंने आपके परिवार को आपसे छीन लिया.”

“इस वक्त तुम सच के बहुत करीब हो. लेकिन सच नहीं जानते.”

“मतलब.”

“मैं अब कुछ नहीं बोलना चाहूँगा. तुम जा सकते हो.”

मेरे अन्दर पता नहीं कितने ही सवाल बिलख रहे थे. मगर मैंने अपने आप को संभाला. काशी अब जवान देना नहीं चाहते थे.

मैं काशी के घर से उठकर दफ्तर चला गया. एडिटर को बोल दिया की इंटरव्यू नहीं हो पाया. डांट पड़ी थी. मुझसे क्राइम बीट छीन ली गयी थी. मगर मैं कोई खबर नहीं बनाना चाहता था. शायद इसलिए क्यूंकि काशी की बात मेरे अन्दर घर कर गयी थी. कि मैं सच के करीब था मगर सच जानता नहीं था. तो उनके बारे में लिख कैसे सकता था. पत्रकारिता का ये पाठ मुझे एक ऐसे आदमी ने सिखाया जो 7 साल की सजा काट के जेल से अभी-अभी निकला था.

अगले दिन रात को जब में घर पंहुचा तो दरवाज़े पे एक चिट्टी मिली.

“समीर,

आज सुबह अख़बार में मैं अपनी खबर धुन्डता रहा मगर मिली नहीं. तुमने लिखी नहीं. इसीलिए तुम्हे अपना सच बता रहा हूँ. मैंने ही अपने परिवार को अपने हाथों से खत्म किया है. उन दंगो की वजह से ही. उन दंगो के अफवाहों की वजह से भी. मेरे सामने कोई नहीं मरा सिवाए मेरे परिवार के. क्यूंकि रोज़ में सुनता और पढता था कि हिन्दुओ के औरतों का मुसलमान बलात्कार कर रहे है. मैंने अपनी दोनों बच्चियों को मार दिया. अपने बेटे को भी. अपनी बीवी को भी. ज़हर मेरे अन्दर भी फैल

ही चूका था मगर तब तक पुलिस आ गयी. मैं बच गया. हर रोज़ थोडा थोडा मरने के लिए. उस दंगे की आड़ में मुझ पर मुक़दमा चला. जेल हुयी. बदकिस्मती ये थी की फांसी भी नहीं मिली. और अब मैंने सोचा है कि अपने आप को मारूंगा नहीं. ये रोज़ रोज़ सांस लेना मेरी सजा है. उसी घर में जहाँ मैंने अपने परिवार को खत्म कर दिया था.

मुझसे फिर मिलने मत आना. और मुझे माफ़ करना.”

काशी पाण्डेय

 

 

 

 

 

 

 

 

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About ishubhampandey

A sincere child of an insincere world.
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2 Responses to कहानी: काशी पाण्डेय

  1. 😢😢😢
    दिल को छू लिया

  2. दिल को छू लेने वाली रचना

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