राशिद सर का कुर्ता

राशिद सर के यहाँ बहुत से गमले थे. मैंने उनसे पुछा कि क्या उन्हें इतना प्यार है फूलों से तो मुस्कुरा के कमरे के अन्दर चले गए. उनकी मुस्कान देख के दोबारा पूछने का मन नहीं किया. ये बहुत था मेरे लिए. अपने दोस्तों को बताता तो कोई मानता नहीं.

राशिद सर मुस्कुराये? पागल बना रहे हो क्या? सब यही बोलते.

मगर राशिद सर मुस्कुराए थे उस दिन. जब वो हिंदी पढ़ाते थे तब उतना मुस्कुराते नहीं थे. क्लास में एकदम चुप्पी रहती थी. दरअसल उन्हें गुस्सा आता था जब बच्चो को उनका पढाया अच्छा नहीं लगता था.

मैं जब उनके घर उनके रिटायरमेंट के एक दिन पहले उनको किताब लौटने गया था, जो मैंने ली थी पढने के लिए मगर कभी पढ़ी नहीं.  उसी वक्त मैंने ये सवाल पूछ लिया.

“सर, आप इतना गुस्सा क्यूँ होते थे हम पे? कहीं इसलिए तो नहीं की बच्चे हिंदी पढना नहीं चाहते.”

“हाँ, इसलिए  भी और इसलिए भी की ऐसे वक्त में हिंदी पढ़ा ही क्यूँ रहा था?”

वो चुप हुए. और फिर मेरी और देख के पूछे, “तुम्हे पता है भाषा कितनी महान होती है?”

“हाँ सर, मतलब भाषा नहीं तो कुछ भी नहीं.”

“मैं जब स्कूल में था, वैद्य, तो मेरी अम्मी मुझे हिंदी का साहित्य ला कर देती थी. मैं पढता भी था. जानते हो, वो पढ़ नहीं सकती थी. मगर उन्होंने मुझे साहित्य पढना सिखाया. जो कहानियाँ में किताबो में पढ़ा नाना उन्हें वही कहानिया सुनाते थे बचपन में. मगर कभी पढने के लिए आगे नहीं बढाया. ये जो तुम लोगो को पढ़ाता हूँ मेरी अम्मी का दिया हुआ है. जब देखता हूँ वही कहानियाँ कोई और नहीं पढ़ना चाहता तो दुःख होता है.”

राशिद सर कल स्कूल में लेक्चर भी देने वाले थे. उनका आखरी दिन होगा. मुझे इस बातचित के बाद लगा की कल कहीं वो रो न दे.

“तुम चाहो तो ये किताब रख सकते हो. वैसे भी मैंने तुम्हे बहुत डाटा है. डांट का मुआवजा समझ के रख लो. और हाँ  प्रेमचंद है ये. धुल मत लगने देना. मेरी बद्दुआ लगेगी तुमको.”

“जी सर. मैं रख लेता हूँ. मैं चलता हूँ सर, कल मिलते है.”

“अच्छा सुनो. ये कुर्ता दे आओगे दरजी को. वो कोने में बैठता है. मैं शाम को जा के ले आऊंगा.”

मैं कुर्ता ले के चला गया. दर्जी को दिया तो वो हसने लगा.

“किस भिकारी का कुर्ता लेके आये हो? इसको सीऊ या इसका एक और कुर्ता बना डालू?”

मैंने देखा तो वो असल में बहुत जगह से फटा था. मैंने सोचा कि राशिद सर ये कुर्ता सिलवाना क्यूँ चाहते है? कहीं ऐसा तो नहीं की कल वो ये पहन  के स्कूल आयें.

“तुम अभी सी दो. जितना भी लगे मैं दे दूंगा.”

मैं हॉस्टल पहुंचा और रात भर न सो पाया. पापा मम्मी से दूर पिछले पांच सालों से रह रहा था. मगर कभी भी इतना बुरा नहीं लगा. मुझे ऐसा लग रहा था की जैसे कल मैं रिटायर हो रहा था. ऐसा तब भी नहीं लगा था जब मुझे पांच साल पहले घर छोड़ के यहाँ शिमला आना था. सबसे दूर. मगर यहाँ पे दोस्तों ने घर की याद कभी आने नहीं दी. आती थी मगर इतनी ज्यादा नहीं.

एकदम से उठकर राशिद सर की दी हुई किताब उठा लिया. प्रेमचंद की गोदान. मैंने रात भर किताब को घूरा. पढ़ा नहीं. आंख कब लग गयी. पता ही नहीं चला.

सुबह स्कूल में सबको इकठ्ठा होना था. राशिद सर की विदाई थी. सारे बच्चे मैदान मे खड़े थे. सब खुश कि आखिरकार बूढ़ा जा रहा है. पता नहीं कितनो के रातों की नींद हराम की थी इसके होमवर्क ने. मगर अब ये आदमी जा रहा था.

प्रिंसिपल ने राशिद सर का नाम लिया. और सर अपनी सीट से उठ कर खड़े हुए. वही कुर्ता पहन रखा था उन्होंने. मैं उनसे दूर था मगर दर्जी का काम देख सकता था. मेरे अगल बगल राशिद सर की खिल्लियाँ उड़ रही थी. पहले मैं भी इस मज़ाक का हिस्सा होता था मगर अब नहीं था.

राशिद सर बोलने के लिए माइक के पास आये. मैं डर गया कि अब क्या होगा. पूरा स्कूल हंस रहा था. कुछ टीचर्स भी. राशिद सर ने चश्मा नाक से उतारा, आँखे मिची और फिर पहन लिए. जैसा की वो हमेशा करते थे क्लास शुरू होने से पहले.

माइक के पास आये तो उनकी सांस लेने की आवाज़ आई. और फिर उन्होंने बोलना शुरू किया.

“मेरे कुर्ते के लिए मैं सभी से माफ़ी चाहता हूँ मगर इसे पहने बिना रहा नहीं गया. ये कुर्ता मेरी अम्मी ने मुझे तब दिया था जब मेरा पहले दिन था स्कूल में. पहली बार इसी कुर्ते को पहन के मैंने बच्चो को पढ़ाया था. आज थोड़ा  फिट नहीं है. फटा भी हुआ है. बिलकुल उसी भाषा की तरह जो मैं आप सब को यहाँ दस साल से पढ़ाता आ रहा हूँ और अपने ज़िन्दगी में ३५ साल पढ़ाया हूँ. हिंदी.

मैंने शायद बहुत दुश्मन भी बनाये है यहाँ. बच्चो में वो भी. आज जाते-जाते मैं सारी दुश्मनी मिटा देना चाहता हूँ. बच्चो से कौन नाराज़ हुआ है भला? मुझे समस्या और गुस्सा आपके माता पीता से है और इस एजुकेशन सिस्टम से है जिसना पढ़ाई को पढ़ाई नहीं छोड़ा. जब मुझे आकर आपके माता पीता बोलते कि इसे इस बार इस कविता का भावार्थ रटा दीजियेगा, तो गुस्सा आता था. नंबर बहुत ज़रूरी थे. भाषा नहीं. मैं ठाकुर साहब से इसीलिए जलता था…अरे आपके ठाकुर सर जो आप लोगो को गणित पढ़ाते है…अरे गणित मतलब मैथ्स….”

सारा स्कूल हंस पड़ा. ये बहुत ही अविश्वास्निया नज़ारा था. इतने सालो तक जो आदमी क्लास में हंसा नही वो आज स्कूल को हंसा रहा है. अपने आखरी दिन पे.

“ठाकुर सर को मैं बोलता था. ये आपने अच्छा नहीं किया. यहाँ हिंदी के सब्जेक्ट में भी अंको की बात हो रही है. खैर. अंक ही आपकी ज़िन्दगी रहेंगे अब से. यहाँ से निकलेंगे तो कॉलेज में एडमिशन अंक पे मिलेगा. कॉलेज से निकलेंगे तो नौकरी भी. नौकरी में भी अंक कभी टारगेट के रूप में होंगे कभी सैलरी के.

मुझे अब कोई गीला नहीं है. बस मैं यहाँ अपने दुश्मन छोड़ के नहीं जाना चाहता. सभी को नमस्कार.”

मुझे लगा नहीं था मगर तालियाँ गूँज उठी. राशिद सर स्टेज से उतरे और स्टाफ रूम चले गए.

वो आखरी बार हमे पढ़ाने आये. वो आये और पढ़ाने भी लग गए. क्लास ख़तम हुई और सारे बच्चे रोज़ की तरह निकल गए. कुछ रुके और सर को फूल दिए. राशिद सर मुस्कुरा रहे थे.

मैं उनके पास गया और उन्हें बधाई दी.

फिर उन्होंने पुछा, ” वैद्य, तुमने किताब पढ़ी?”

“नहीं सर. अभी तक नहीं.’

“पहले पन्ना भी नहीं खोला?”

“नहीं सर. मगर जल्द ही पढूंगा.”

“हाँ जल्द ही पढना.”

शाम को राशिद सर का सामान गाड़ी  में लद के जा रहा था. वो घर से अपने सामान को निकलते और गाड़ी में लदते देख रहे थे. अभी भी उसी कुर्ते में थे. जब सब सामान लद गया तो वो भी गाड़ी में बैठ के चले गए.

रात को हॉस्टल आया तो किताब उठाई और पहला पन्ना खोला. पूरी किताब पढ़ ली उस रात. अगले दिन सुबह उठा और स्कूल चला गया चुप चाप. जाने का मन नहीं था. एक अजीब सी उदासी और घबराहट थी. सुबह की असेंबली फिर हुई मगर राशिद सर नहीं दिखे. ऐसे ही किसी क्लास के बगल में खड़े रहते थे.

सुबह की वंदना शुरू होती, उस से पहले प्रिंसिपल आये और उन्होंने खबर दी की राशिद सर की कल रात अपने घर जाते कार का एक्सीडेंट हो गया. उनकी कार खाई में गिर गयी थी. मैं अपने कानो पर भरोसा नहीं कर पा रहा था. ऐसा कैसे हो सकता था. मगर ऐसा हो चूका था. सभी उदास हुए लेकिन मुझे ये अजीब लगा.

मैं भाग के अपने हॉस्टल चला गया. मैंने अपने टेबल से किताब उठाई और पहला पन्ना खोला. उसपर उन्होंने कुछ लिखा था

“वैद्य, मेरे घर में मेरे गमले रखे हुए है अभी भी. उनका ख्याल रखना. मैं आऊंगा तो ले जाऊंगा. रोज़ भी पानी न दे पाओ तो चलेगा मगर दो दिन में एक बार पानी ज़रूर दे देना. ये बातें यहाँ लिख रहा हूँ क्यूंकि तुमसे ये सब बोलना अच्छा नहीं लगा. तुम विद्यार्थी हो मेरे. मैं एक महीने बाद आऊंगा और उन्हें ले जाऊंगा.”

राशिद सर कभी लौट के नहीं आयें. उन गमलो में मगर एक महीने बाद फूल ज़रूर उग आये. उन्हें अभी भी संभल के रखा है मैंने. उनकी किताब भी. आज जब मैं हिंदी पढाने के लिए क्लास में घुसता हूँ तो वो किताब और उस गमले के फूल ले के घुसता हूँ. रशीद सर की तरह बच्चे मुझसे नफरत नहीं करते. मैं उनकी तस्वीर के आगे जाके हमेशा उन्हें इस बात से चिड़ाता हूँ. उन्होंने मुझे सब कुछ दिया है. हिंदी, फूल और ज़िन्दगी की अहमियत.

 

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A sincere child of an insincere world.
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