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इस वक्त मोचीराम नहीं पढ़ा तो क्या पढ़े

ये कविता सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’ की कविता है. हमारी नहीं. मनाते ये हैं की काश हम कुछ ऐसा लिख पाते. लेकिन इस कविता को लिख पाना जीवन को एक पल में जी लेने जैसा होगा. मैंने धूमिल को पढ़ना तीन … Continue reading

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